मध्य प्रदेश के चार धरोहर स्थलों को मिली यूनेस्को मान्यता
मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड ने भारत के यूनेस्को विश्व धरोहर कार्यक्रम के तहत कई महत्वपूर्ण विरासत संपत्तियों को टेंटेटिव सूची में शामिल करने के लिए प्रस्तावित किया है। इस प्रक्रिया के तहत प्रदेश की चार प्रमुख धरोहरों को मान्यता दी जाएगी। इनमें बाग गुफाओं के भित्ति चित्र, गिनौरगढ़ का किला, चंबल घाटी के मंदिरों का समूह और उदयगिरि की गुफाएं शामिल हैं। यह कदम मध्य प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को वैश्विक पहचान दिलाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास है। यूनेस्को की टेंटेटिव सूची उन संपत्तियों की एक राष्ट्रीय सूची है जिन्हें भविष्य में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया जा सकता है। यह नामांकन प्रक्रिया का एक आवश्यक प्रारंभिक चरण है। मध्य प्रदेश के लिए यह एक नया अवसर है जिससे प्रदेश की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिलेगी। मध्य प्रदेश की अमूर्त धरोहर में गोंड चित्रकला और 'मैहर बैंड' जैसे अद्वितीय सांस्कृतिक तत्व शामिल हैं। गोंड चित्रकला ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है और यह प्रदेश की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है। 'मैहर बैंड' भारतीय शास्त्रीय वाद्य-संगीत का एक दुर्लभ समन्वय प्रस्तुत करता है, जो इसकी सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है। अगरिया समुदाय की पारंपरिक 'लौह गलाने की तकनीक' भी इस सूची में शामिल धरोहरों का हिस्सा है। यह तकनीक भारत के समृद्ध देशज ज्ञान और प्राचीन धातुकर्म कौशल को प्रदर्शित करती है। इसके अलावा, 'निमाड़ के विशिष्ट व्यंजन' जैसे दाल-पानिये यहाँ की खानपान संस्कृति को जीवंत करते हैं। मध्य प्रदेश की आध्यात्मिक चेतना का प्रतीक 'नर्मदा परिक्रमा' जन-आस्था और सांस्कृतिक निरंतरता को दर्शाती है। यह परिक्रमा न केवल आध्यात्मिक महत्व रखती है, बल्कि यहाँ के जनजातीय अंचल के प्रसिद्ध 'भगोरिया नृत्य' जैसे लोकजीवन के उल्लास और सामाजिक समरसता की सजीव अभिव्यक्ति का भी प्रतीक है। इससे पहले, साल 2024 में ग्वालियर किला, बुरहानपुर का खूनी भंडारा, चंबल घाटी के शैल कला स्थल, भोजपुर का भोजेश्वर महादेव मंदिर, रामनगर (मंडला) के गोंड स्मारक और धामनार के ऐतिहासिक समूह को इस सूची में शामिल किया गया था। पूर्व के वर्षों में, साल 2021 में नर्मदा घाटी का भेड़ाघाट-लामेताघाट और सतपुड़ा टाइगर रिजर्व, साल 2019 में ओरछा का ऐतिहासिक समूह, साल 2014 में भारत के प्रतिष्ठित साड़ी बुनाई समूह तथा साल 1998 में मांडू के स्मारकों के समूह को इस प्रतिष्ठित सूची में स्थान प्राप्त हुआ था। मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड ने इन धरोहरों की पहचान और संरक्षित करने के लिए कई प्रयास किए हैं। यह प्रयास प्रदेश की संस्कृति को संजोने और इसे भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाने का एक महत्वपूर्ण कदम है। यूनेस्को की टेंटेटिव सूची में शामिल होना न केवल मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर की मान्यता है, बल्कि यह पर्यटकों के लिए भी एक आकर्षण का केंद्र बनेगा। इससे प्रदेश में पर्यटन गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा और स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती मिलेगी। मध्य प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहरों की पहचान के लिए यह कदम बहुत महत्वपूर्ण है। इससे न केवल प्रदेश के इतिहास और संस्कृति को संरक्षण मिलेगा, बल्कि स्थानीय कला और शिल्प को भी एक नई पहचान मिलेगी। आने वाले समय में, मध्य प्रदेश की ये धरोहरें न केवल भारतीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व करेंगी, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी छाप छोड़ेंगी। यह प्रक्रिया प्रदेश की समृद्ध धरोहर को वैश्विक मंच पर लाने का एक अद्वितीय अवसर प्रदान करती है।
