पशुधन के स्वास्थ्य संवर्धन और सुरक्षा हेतु दूध चढ़ाने की अनूठी परंपरा, लाखों श्रद्धालु आते हैं
मध्यक्षेत्र के सबसे बड़े मेलों में से एक, जहाँ लाखों श्रद्धालु आते हैं
भारत विविध संस्कृतियों और परंपराओं का देश है, जो अपने जीवंत त्योहारों के लिए प्रसिद्ध है। हमारे देश में कुछ किलोमीटर के अंतराल पर ही स्थानीय बोली, परिवेश और सांस्कृतिक विविधता देखने को मिलती है। तीज, त्योहारों और मेलों का जीवन में विशेष महत्व है, जो हमारी समृद्धशाली सांस्कृतिक का प्रतीक हैं। भारतीय संस्कृति में केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि सृष्टि के प्रत्येक प्राणी के कल्याण की कामना की जाती है। इसी परंपरा का निर्वाह करते हुए सीहोर जिला मुख्यालय से 35 किलोमीटर दूर बारह खम्बा मेला लगता है, जहाँ पशुओं के स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यह अनूठी परंपरा दीपावली के दूसरे दिन, यानी पड़वाँ को इछावर तहसील के ग्राम देवपुरा में निभाई जाती है। मध्यक्षेत्र के सबसे बड़े मेलों में से एक इस आयोजन में लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। यहाँ जनजातीय वर्ग के लोग अपने ईष्ट देव की शिला का दूध से अभिषेक और पूजा-अर्चना कर अपने पशुधन के स्वास्थ्य और सुरक्षा की कामना करते हैं। सुबह से शाम तक हजारों लीटर दूध से देवशिला का अभिषेक किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि देवशिला पर दुधारू पशु का दूध चढ़ाने से वे साल भर रोगमुक्त रहते हैं। जनजातीय समुदाय के अलावा, सभी वर्गों के श्रद्धालु इस मेले में आते हैं, और यह प्रदेश के बड़े मेलों में गिना जाता है, जिसमें दो लाख से अधिक श्रद्धालु जुटते हैं। बारह खंबा मेला इछावर में प्राचीन काल से लगता आ रहा है। इछावर से 15 किमी दूर देवपुरा गाँव में जनजातीय समुदाय के आराध्य देव की देवरूपी शिला है, जिसे बारह खंबा वाले देव महाराज के नाम से जाना जाता है। यह शिला 12 शिला स्तम्भों से बनी छत के नीचे विद्यमान थी, जिसके कारण इस स्थान का नाम बारह खंबा पड़ा। वर्तमान में देवपुरा गाँव बारह खंबा के नाम से ही जाना जाता है।
उस देवशिला पर पड़वाँ के दिन दूध चढ़ाओ, फिर साल भर तुम्हारे पशु स्वस्थ रहेंगे। यह बात किसान ने ग्रामवासियों को बताई। तभी से दीपावली के दूसरे दिन यानी पड़वाँ को दूध चढ़ाने की प्रथा शुरू हो गई और यह मेला लगने लगा। यह परंपरा न केवल पशुधन की सुरक्षा सुनिश्चित करती है, बल्कि स्थानीय संस्कृति और आस्था का भी एक महत्वपूर्ण प्रतीक है।
लाखों श्रद्धालु इस अनूठी परंपरा का हिस्सा बनने के लिए देवपुरा पहुँचते हैं, जो भारतीय संस्कृति की विविधता और प्राणियों के प्रति प्रेम को दर्शाता है। यह मेला पशुधन के स्वास्थ्य संवर्धन और सुरक्षा के प्रति गहरी आस्था का केंद्र बन गया है। यह आयोजन क्षेत्र की सांस्कृतिक धरोहर का एक अभिन्न अंग है, जो पीढ़ियों से चली आ रही है और भविष्य में भी जारी रहने की उम्मीद है।
