धरनावदा निवासी रतिराम ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय पूरनलाल कुशवाह ने करीब तीन दशक पहले धरनावदा पुलिस थाने के निर्माण के लिए अपनी निजी जमीन शासन को दी थी। परिवार का आरोप है कि बदले में मिली जमीन का नामांतरण अब तक उनके नाम पर नहीं हुआ है, जबकि जमीन पुलिस थाने के नाम दर्ज हो चुकी है। रतिराम ने यह भी बताया कि उनके पिता ने सर्वे नंबर 181 की करीब 1.473 हेक्टेयर भूमि पुलिस थाने के लिए दी थी। इसके बदले शासन ने सर्वे नंबर 33 की 0.690 हेक्टेयर शासकीय भूमि में से 1.473 हेक्टेयर भूमि विनिमय में देने की स्वीकृति दी थी। परिवार का कहना है कि तहसील स्तर पर उन्हें बताया जाता है कि नामांतरण हो चुका है, लेकिन पटवारी रिकॉर्ड में ऐसी कोई जमीन उनके नाम दर्ज नहीं होने की बात कहता है। इस असंगति ने परिवार को सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पर मजबूर कर दिया है। मंगलवार को पीड़ित परिवार बड़ी-बड़ी तख्तियां लेकर कलेक्ट्रेट पहुंचा और जनसुनवाई में कलेक्टर से गुहार लगाई कि वर्ष 1996 में तत्कालीन कलेक्टर इकबाल सिंह बैंस के आदेश के बावजूद अब तक राजस्व रिकॉर्ड में जमीन उनके नाम दर्ज नहीं हुई है। परिवार के पास वर्ष 1996 में तत्कालीन कलेक्टर द्वारा पारित आदेश भी मौजूद है, जिसमें स्पष्ट रूप से जमीन के नामांतरण के निर्देश दिए गए थे। आदेश में तहसीलदार और अनुविभागीय अधिकारी की जांच के बाद भूमि विनिमय को स्वीकृति देते हुए राजस्व अभिलेख में प्रविष्टि किए जाने के निर्देश दिए गए थे। रतिराम का आरोप है कि इतने स्पष्ट आदेश के बाद भी जमीन उनके परिवार के नाम दर्ज नहीं की गई है। उन्होंने कलेक्टर से पुराने आदेश के आधार पर रिकॉर्ड की जांच कर सर्वे नंबर 33 में स्वीकृत भूमि का नामांतरण तत्काल कराने की मांग की है। परिवार ने बताया कि जिस जमीन को उन्होंने थाने के लिए दिया था, वह सरकारी रिकॉर्ड में पुलिस थाने के नाम दर्ज हो चुकी है, लेकिन बदले में स्वीकृत जमीन उन्हें कागजों में आज तक नहीं मिल सकी। रतिराम ने कहा कि उनके पिता का 23 अप्रैल 2018 को निधन हो चुका है। अब परिवार अपने अधिकारों के लिए न्याय की तलाश कर रहा है। इस मामले में कलेक्टर इकबाल सिंह बैंस के द्वारा दिए गए आदेश की अनदेखी होना परिवार के लिए एक बड़ा मुद्दा बन चुका है। परिवार अब अपनी खोई हुई जमीन के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाने का विचार कर रहा है। सरकारी दफ्तरों में चक्कर लगाने के बाद भी जब उन्हें कोई समाधान नहीं मिला, तो उन्होंने अपनी बात कलेक्ट्रेट में रखी। रतिराम का कहना है कि उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद है। इस मामले ने प्रशासनिक प्रक्रिया की गंभीरता पर सवाल उठाए हैं। कैसे एक परिवार को इतना लंबा समय बिना किसी न्याय के गुजारना पड़ता है, यह चिंता का विषय है।
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किसान परिवार ने थाने के लिए दी जमीन, अब भी नामांतरण नहीं हुआ
29 सितंबर 2026 को 10:59 pm बजे

किसान परिवार ने थाने के लिए दी जमीन, अब भी नामांतरण नहीं हुआ
