पुस्तक में गाड़िया लौहारों का उद्भव, संस्कृति और जीवनशैली का विस्तृत वर्णन
मेवाड़ के गाड़िया लौहार समाज के जीवन और संस्कृति पर आधारित 163 पन्नों की एक अनूठी पुस्तक प्रकाशित हुई है। यह पुस्तक उन गाड़िया लौहार परिवारों के बारे में है जो मुगलों के साथ महाराणा प्रताप के संघर्ष में अपने कठोर प्रण के साथ शामिल रहे थे। इस ग्रंथनुमा पुस्तक में पहली बार इस समाज की वाचिक परंपरा और जीवनशैली को दर्ज किया गया है। खास बात यह है कि इसमें योगदान राजस्थान का नहीं, बल्कि अन्य राज्यों का है। समाजशास्त्री अनिता सोनी ने इस पुस्तक को लिखने के लिए लगभग चार साल तक गाड़िया लौहार परिवारों के बीच रहकर उनके रहन-सहन, बोली और पहनावे का बारीकी से अध्ययन किया। उन्होंने अपनी यात्राओं के दौरान इन परिवारों को सड़कों के किनारे या अन्य जगहों पर रहते देखा, और उनकी बैलगाड़ियों के साथ जीवनशैली ने उन्हें आकर्षित किया। अनिता सोनी ने देखा कि यह समाज आज भी घुमंतू जीवन जीता है, और यही बात उन्हें इस पर किताब लिखने के लिए प्रेरित कर गई। उन्होंने जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद भोपाल के निदेशक धर्मेंद्र पारे से संपर्क किया। पारे ने उन्हें परिवार के बीच रहकर समाज को समझने की चुनौती दी, जिसे अनिता ने स्वीकार किया। उन्होंने रतलाम सहित मध्य प्रदेश की कई जगहों पर गाड़िया लौहार परिवारों के बीच जाकर अपना उद्देश्य बताया। उन्हें जानकारी मिली कि यह समाज मूल रूप से चित्तौड़ या मेवाड़ से जुड़ा है, जिसके बाद उन्होंने वहां काम शुरू किया। चित्तौड़ के ओछड़ी में जब अनिता सोनी को गाड़िया लोहार की बस्ती दिखी, तो वहां रह रहे परिवारों को जब उन्होंने अपना मकसद बताया, तो उन्होंने खुद साथ रहने का आग्रह किया।
महाराणा प्रताप के संघर्ष में शामिल गाड़िया लौहारों की वाचिक परंपरा पहली बार पुस्तक में दर्ज
इस कार्य में मेहताब महाराज, सत्तूबाई, जगदीश राठौड़, पिंटू, कालूराम फौजी, सीमा राठौर, तुलसीराम, हीराबाई और भागीरथ सिसोदिया रानीखेडा जैसे कई लोगों का भी योगदान रहा। जनजातीय संग्रहालय के निदेशक धर्मेंद्र पारे का मार्गदर्शन इस पुस्तक को प्रकाशित करने में अहम साबित हुआ। यह प्रकाशन अकादमी के पिछले साल 10 घुमंतू समुदायों पर टॉकिंग डिक्शनरी के निर्माण के बाद एक महत्वपूर्ण कदम है। जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी मध्य प्रदेश संस्कृति परिषद भोपाल ने इस पुस्तक को प्रकाशित किया है। यह प्रकाशन अकादमी के पिछले वर्ष 10 घुमंतू समुदायों पर टॉकिंग डिक्शनरी के निर्माण के बाद एक महत्वपूर्ण कदम है। इस परियोजना के अगले चरण में, अनिता सोनी गाड़िया लौहार समुदाय पर केंद्रित घुमंतू भाषा की प्रिंट डिक्शनरी पर 2 साल से काम कर रही हैं।

