गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना को मौलिक अधिकार घोषित करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पुलिसिया रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय, उसे उसकी भाषा में और जल्द से जल्द लिखित में गिरफ्तारी के कारणों की जानकारी देना अनिवार्य है। यह सूचना आरोपी को अपने बचाव की तैयारी करने, पुलिस रिमांड या न्यायिक अभिरक्षा का विरोध करने और जमानत मांगने का पर्याप्त अवसर देने के उद्देश्य से दी जानी चाहिए। इस नियम का उल्लंघन करने पर गिरफ्तारी को अवैध माना जाएगा और आरोपी को रिहा किया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने अपने हालिया फैसलों, जैसे 'जसकरण जीत सिंह देओल' (2026) प्रकरण में, इस सिद्धांत को और मजबूत किया है। इन मामलों में यह पाया गया कि पुलिस ने आरोपितों को गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना नहीं दी, जिसके बाद कोर्ट ने लापरवाह अधिकारियों के विरुद्ध विभागीय जांच के आदेश दिए। कोर्ट का मानना है कि संवैधानिक प्रविधानों का असली मकसद तभी पूरा होगा जब गिरफ्तारी के आधार लिखित में उपलब्ध कराए जाएं, क्योंकि गिरफ्तारी व्यक्ति के जीवन और गरिमा पर गहरा असर डालती है। यह निर्देश संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत दिए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि गिरफ्तार व्यक्ति को जितनी जल्दी हो सके, गिरफ्तारी के आधारों के बारे में बताया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने 'प्रबीर पुरकायस्थ' (2024) और 'विहान कुमार' (2025) जैसे प्रकरणों में भी इस पर जोर दिया है। कोर्ट के अनुसार, चाहे मामला किसी भी कानून के तहत हो, गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना देना सभी अपराधों में अनिवार्य है।
समाचार
गिरफ्तारी के आधारों की लिखित सूचना मौलिक अधिकार: सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को दिए कड़े निर्देश
5 अक्टूबर 2026 को 11:26 pm बजे
