पश्चिम बंगाल के कोलकाता में पिता-पुत्र को निर्वस्त्र कर सड़क पर घुमाने की घटना सभ्य समाज की संवेदनशीलता, कानून-व्यवस्था और मानवीय मूल्यों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। किसी व्यक्ति के साथ इस तरह का अमानवीय व्यवहार न केवल उसकी गरिमा और सम्मान को ठेस पहुँचाता है, बल्कि कानून को अपने हाथ में लेने की आपराधिक मानसिकता को भी दर्शाता है। यदि किसी व्यक्ति पर लगे आरोपों को आधार बनाकर लोग खुद ही सजा का फैसला करने लग जाएँ, तो फिर कानून-व्यवस्था और न्यायिक प्रक्रिया का क्या अर्थ रह जाएगा? इस मामले में आरोपियों की शर्मनाक हरकत पर ही सवाल नहीं उठ रहे हैं, बल्कि पुलिस की कार्यप्रणाली भी कठघरे में है। खबरों के मुताबिक, आरोपियों को गिरफ्तार करने के बाद पुलिस ने उन्हें कमर पर रस्सियाँ बाँधकर बिना कमीज के नंगे पैर इलाके में घुमाया। एक ओर, पुलिस अपराध को रोक पाने में प्रभाव के स्तर पर भी नाकाम होती है, वहीं वह कानूनी प्रक्रिया पर अमल के बजाय दिखावे की कार्रवाई को तरजीह देती है। गौरतलब है कि कोलकाता के सरसुना क्षेत्र में बीते रविवार को एक लड़का अपनी मित्र से मिलने गया था। इसके बाद लड़की के परिजनों ने लड़के को पकड़ लिया और उसके पिता को भी वहाँ बुलाकर दोनों को निर्वस्त्र करके सड़क पर घुमाया गया। इस तरह की घटनाएँ समाज में बढ़ती असहिष्णुता, प्रतिशोध की भावना और कानून के प्रति घटते सम्मान को दर्शाती हैं। इसका असर केवल पीड़ित तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसके परिवार और समाज पर भी पड़ता है। इससे लोगों में भय का माहौल पैदा होता है और कानून-व्यवस्था के प्रति विश्वास कमजोर होता है। अगर कोई व्यक्ति किसी अपराध में शामिल है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई करना कानून का काम है। महज आरोपों के आधार पर सार्वजनिक रूप से इस कदर अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं है। लोकतांत्रिक समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह हर नागरिक के अधिकारों और सम्मान की रक्षा कितनी मजबूती से करता है। कानून का शासन तभी कायम रहता है, जब न्यायिक प्रक्रिया का सम्मान हो और दोषी को विधिसम्मत प्रक्रिया के तहत सजा मिले। यह घटना न केवल व्यक्तिगत गरिमा का उल्लंघन है, बल्कि यह व्यवस्था पर भी गहरा आघात है। जब नागरिक स्वयं ही कानून को अपने हाथ में लेने लगते हैं, तो यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति है जो समाज की नींव को कमजोर करती है। पुलिस की भूमिका यहाँ दोहरी हो जाती है - एक तरफ उन्हें अपराध रोकना है, वहीं दूसरी तरफ उन्हें नागरिकों के अधिकारों की रक्षा भी करनी है। इस मामले में पुलिस द्वारा की गई कार्रवाई, यानी आरोपियों को कमर पर रस्सी बाँधकर घुमाना, निश्चित रूप से कानूनी प्रक्रिया के दायरे से बाहर है और यह स्वयं ही एक प्रकार का दुर्व्यवहार है। इस तरह की घटनाएं एक विकृत मानसिकता का प्रतीक हैं जहाँ सामूहिक उन्माद या व्यक्तिगत प्रतिशोध को न्याय पर हावी होने दिया जाता है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि किसी भी व्यक्ति को, चाहे उसने कोई भी अपराध किया हो, सार्वजनिक रूप से अपमानित करने का अधिकार किसी को नहीं है।
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कोलकाता: पिता-पुत्र का सरेराह अपमान, पुलिसिया कार्रवाई पर सवाल
28 अक्टूबर 2026 को 10:17 pm बजे
