समीत मच्छर ने विमान में आतंकी हमला रोका
भारतीय पायलट स्मित मच्छर ने विमान में आतंकी हमला टालकर लाखों जिंदगियां बचाईं, लेकिन कुछ विपक्षी नेताओं की चुप्पी ने इस मामले को राजनीतिक रंग दे दिया है, जिसे वोट बैंक की राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है
विमान में एक आत्मघाती आतंकी हमला नाकाम कर भारतीय पायलट स्मित मच्छर दुनिया भर के लिए हीरो बन गए हैं। उन्होंने अपने अप्रतिम साहस से अल-हम्मामी के शैतानी इरादों को नाकाम कर दिया, जिसका मकसद तेल अवीव जा रहे विमान को उड़ाना था। यह घटना एक बार फिर आतंकवाद की भयावहता और उससे लड़ने की जटिलताओं को उजागर करती है। स्मित मच्छर का यह कारनामा जहाँ लाखों जिंदगियों को बचाने वाला साबित हुआ, वहीं कुछ राजनीतिक गलियारों में उनकी चुप्पी चिंताजनक है। सोचिए, अगर स्मित मच्छर समय रहते अल-हम्मामी के इरादों को नहीं भांप पाते तो क्या होता? यह 9/11 सरीखी भीषण आतंकी घटना हो सकती थी, जिसमें 174 यात्रियों की जान जा सकती थी और पश्चिम एशिया के हालात और भी बिगड़ सकते थे। यह कोई कयास नहीं, बल्कि हकीकत है। अल-हम्मामी, जो फ्लाईदुबई का को-पायलट था, अलकायदा से प्रेरित होकर एक 'लोन वुल्फ' आतंकी के तौर पर काम कर रहा था। उसका इरादा पायलट को मारकर विमान को तेल अवीव के हवाईअड्डे पर गिराना था। यह घटना सिद्ध करती है कि आतंकवाद से लड़ना इसलिए भी कठिन है क्योंकि इसका कोई निश्चित ठिकाना नहीं कि कौन कब अतिवादी-जिहादी विचारों से भर जाए। आतंकवाद की यह समस्या केवल कुछ देशों या संगठनों तक सीमित नहीं है। भारत में भी अलकायदा और आईएस जैसे संगठनों के साथ हाथ बंटाने वाले लोग सामने आ चुके हैं। ऐसे में, हमास जैसे संगठनों से सहानुभूति रखने वालों की मौजूदगी पर हैरानी नहीं होनी चाहिए। हाल ही में केरल में एक रैली का आयोजन किया गया, जिसमें हमास नेता खालिद मशाल का वर्चुअल भाषण कराया गया। यह रैली फलस्तीनी लोगों के समर्थन के नाम पर बुलाई गई थी, लेकिन इसमें हमास नेता को शामिल करना यह दर्शाता है कि कुछ लोग इजरायल को शत्रु मानने से आगे बढ़कर उसकी तबाही की कामना भी करते हैं। इस रैली में 'बुलड़ोजर हिंदुत्व और रंगभेदी यहूदीवाद को उखाड़ फेंकने' जैसे नारे भी लगाए गए, जो कट्टरपंथी विचारों को बढ़ावा देते हैं। यह नई आदत नहीं है। जब भी कोई बड़ी आतंकी घटना होती है, तो कुछ तत्व उसे 'फाल्स फ्लैग ऑपरेशन' बताकर दुष्प्रचार करने लगते हैं। स्मित मच्छर की बहादुरी को नाकाम करने वाले भी इसी दुष्प्रचार का हिस्सा हैं। वे इसे इजरायली प्रधानमंत्री के इशारे पर की गई कार्रवाई बता रहे हैं, ताकि वे चुनावी लाभ उठा सकें। यह तर्क हास्यास्पद है कि जिस आतंकी घटना को एक भारतीय पायलट ने नाकाम किया, उससे इजरायली प्रधानमंत्री को चुनावी लाभ कैसे मिल जाएगा? यह वही कुतर्क है जो पहले भी दोहराया गया है।

