कैंसर के बढ़ते मामलों से निपटने के लिए भारत में इसे एक 'नोटिफायेबल डिजीज' यानी सूचित की जाने वाली बीमारी बनाने की लंबे समय से चली आ रही मांग अब हकीकत के करीब पहुंचती दिख रही है। सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से कहा है कि जहां कैंसर को अभी तक ऐसी बीमारी घोषित नहीं किया गया है, वहां इस पर विचार करें। यह कदम कैंसर के मामलों की गिनती, योजना बनाने और प्रतिक्रिया देने के तरीके में एक बड़ा बदलाव ला सकता है। भारतीय कैंसर सोसाइटी, जो 2026 में अपने 75 साल पूरे करेगी, बेहतर कैंसर देखभाल की नींव मजबूत डेटा को मानती है और इसलिए वह लंबे समय से कैंसर की बेहतर निगरानी की वकालत करती आ रही है। कैंसर की सूचना प्रणाली को प्रभावी बनाने के लिए, देश भर के छोटे अस्पतालों और डायग्नोस्टिक केंद्रों सहित सभी स्वास्थ्य सुविधाओं से डेटा का प्रवाह एक ऐसे केंद्रीय सिस्टम में होना आवश्यक है जो इन आंकड़ों को एकीकृत कर सके। हालांकि, रिपोर्टिंग और सूचना के उपयोग में राज्यों के बीच भिन्नता के कारण एक समान राष्ट्रीय तस्वीर बनाना मुश्किल हो जाता है। इस समस्या के समाधान के लिए, केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर कैंसर की सूचना के लिए सामान्य दिशानिर्देशों की तत्काल आवश्यकता है। स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय को एक मानक न्यूनतम डेटासेट, सामान्य परिभाषाएं, समय- सीमा, समान सुरक्षा उपाय और अनुपालन नियम स्थापित करने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि क्या केंद्र से अनिवार्य दिशानिर्देशों की आवश्यकता है ताकि सूचना प्रणाली में एकरूपता लाई जा सके।
समाचार
कैंसर की गिनती और प्रबंधन में क्रांति: भारत में 'नोटिफायेबल डिजीज' बनने की कवायद में तेजी
5 अक्टूबर 2026 को 11:26 pm बजे
