विद्यालय बच्चों के लिए शिक्षा का केंद्र भर नहीं, बल्कि उनके सुरक्षित भविष्य की पहली पाठशाला भी होते हैं। अभिभावक अपने बच्चों को इस भरोसे के साथ स्कूल भेजते हैं कि वहां पढ़ाई के अलावा भी उनकी देखभाल होगी और वे सुरक्षित रहेंगे। मगर जब विद्यालय परिसर में ही बच्चों की जान जोखिम में आने लगे, तो भरोसा टूटना स्वाभाविक है। दिल्ली के मयूर विहार में नौ साल की बच्ची की कक्षा में अचानक गिरने के बाद हुई मौत ने स्कूलों की आपातकालीन चिकित्सा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। परिजनों ने समय पर प्राथमिक उपचार और सीपीआर नहीं दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। बुनियादी सवाल यह है कि क्या विद्यालय ऐसी आपात स्थितियों से निपटने के लिए तैयार हैं? उत्तर प्रदेश के बलरामपुर में गणेश विसर्जन जुलूस के दौरान डीजे के शोर के बीच कक्षा में बैठी सात साल की बच्ची की मौत हो गई थी। आंध्र प्रदेश में शिक्षक की कथित पिटाई के बाद छह साल के बच्चे की मौत से लेकर पंचकूला के एक स्कूल में छात्रा पर एक अन्य छात्र के हमले ने भी विद्यालयों में बच्चों की सुरक्षा की चिंता बढ़ाई है। इन घटनाओं की प्रकृति अलग-अलग है, लेकिन इनके पीछे व्यवस्था की जवाबदेही का साझा सवाल है। स्कूलों में निगरानी, प्रशिक्षित कर्मचारियों, प्राथमिक चिकित्सा, आपातकालीन सहायता और बच्चों के बीच हिंसा रोकने के इंतजाम कितने प्रभावी हैं? केवल सीसीटीवी कैमरे लगा देना सुरक्षा की गारंटी नहीं हो सकता। जरूरी है कि उनकी नियमित निगरानी हो और किसी भी अप्रिय घटना पर तत्काल कार्रवाई की व्यवस्था भी हो। विडंबना है कि शिक्षा संस्थानों में अनुशासन और नैतिकता का पाठ पढ़ाया जाता है, लेकिन बच्चों की सुरक्षा के बुनियादी इंतजामों में लापरवाही सामने आती रहती है। यह लापरवाही न केवल बच्चों के जीवन को खतरे में डालती है, बल्कि शिक्षा के मंदिर के प्रति अभिभावकों के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती है। सरकारों और शिक्षा विभागों को स्कूलों की जवाबदेही तय करनी होगी। नियमित सुरक्षा ऑडिट, प्राथमिक उपचार का प्रशिक्षण, चिकित्सकीय सुविधाएं और शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई अनिवार्य होनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना होगा कि हर स्कूल इन बुनियादी सुरक्षा मानकों का पालन करे। बच्चों की सुरक्षा किसी स्कूल की कृपा या प्रबंधन की सुविधा का विषय नहीं, बल्कि उसकी कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को किसी भी हाल में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। स्कूलों को इस बाबत सख्त नियमों का पालन करना होगा। शिक्षा का मंदिर विद्यालय तभी भरोसेमंद हो सकता है, जब वहां बच्चों का बचपन भी सुरक्षित हो। स्कूलों में ऐसी दुर्घटनाएं न हों, इसके लिए सतत निगरानी और सुधार की आवश्यकता है। यह सुनिश्चित करना हम सबकी सामूहिक जिम्मेदारी है। अभिभावकों को भी अपने बच्चों की सुरक्षा को लेकर जागरूक रहना चाहिए और स्कूलों के प्रबंधन से इस संबंध में नियमित जानकारी लेनी चाहिए। किसी भी तरह की ढिलाई या लापरवाही पर तुरंत आवाज उठाना आवश्यक है।
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बच्चों की मौत से स्कूलों की आपातकालीन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
6 नवंबर 2026 को 11:08 pm बजे

बच्चों की मौत से स्कूलों की आपातकालीन व्यवस्था पर उठे गंभीर सवाल
