मतदाता पहचान पत्र होने के बावजूद मतदाता सूची से नाम कटने पर मतदान न कर पाने की समस्या को दूर करने के लिए जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 की धारा 62(1) में संशोधन आवश्यक है। यह कानून, जो 75 वर्ष पुराना है, केवल उन्हीं व्यक्तियों को मतदान का अधिकार देता है जिनका नाम संबंधित मतदाता सूची में दर्ज हो। हालांकि, 1993 से मतदाता पहचान पत्र को मतदाता होने का एक ठोस प्रमाण माना जाता है, और चुनाव आयोग स्वयं मतदाता सूची और मतदाता पहचान पत्र दोनों जारी करता है। इस विसंगति के कारण, जब मतदाता सूची से नाम कट जाता है, तो मतदाता पहचान पत्र होने पर भी वे मतदान से वंचित रह जाते हैं। यहां तक कि यदि कोई नागरिक 17 वर्ष का है, तो भी वह अपना पंजीकरण करा सकता है, ताकि 18 वर्ष की आयु होने पर उसका नाम मतदाता सूची में स्वतः जुड़ जाए। विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआइआर) के दौरान मतदाता सूची को नए सिरे से तैयार किया जाता है, जिसमें मृत, डुप्लीकेट या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाए जाते हैं और नए नाम जोड़े जाते हैं। इस प्रक्रिया में जमीनी स्तर पर बीएलओ आदि कर्मचारियों से त्रुटियां हो सकती हैं, लेकिन इसे वोट चोरी का नैरेटिव देना राजनीतिक लाभ के लिए अनुचित है। यदि किसी का नाम मतदाता सूची से कट भी जाता है, तो वह फार्म-6 भरकर अपना नाम पुनः जुड़वा सकता है, और नामांकन की अंतिम तिथि तक भी यह संभव है। चुनाव आयोग अधिक से अधिक मतदान सुनिश्चित करने के लिए लगातार प्रयास करता है, जिसमें महिलाओं, 85 वर्ष के मतदाताओं, दिव्यांगों और अन्य वैध मतदाताओं को प्रेरित करना शामिल है। इसके बावजूद, कई बार पूरे परिवार का नाम मतदाता सूची से गायब हो जाता है, भले ही उनके पास मतदाता पहचान पत्र हों। आयोग 12 अन्य पहचान पत्रों को भी मान्यता देता है, लेकिन मतदाता पहचान पत्र की अपनी विशिष्टता है, जिस पर एक अल्फा न्यूमेरिक नंबर होता है, जो मतदाता सूची में भी अंकित होता है। ऐसे में, नागरिक और गैर-नागरिक को कैसे चिह्नित किया जाए, यह एक बड़ी चुनौती है। ऐसी स्थिति में, बायोमीट्रिक या रेटिनल टेस्ट जैसे तरीकों से तत्काल पंजीकरण संभव हो सकता है।
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मतदाता सूची से नाम कटने पर मतदान में बाधा, जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन जरूरी
31 अक्टूबर 2026 को 10:52 pm बजे

मतदाता सूची से नाम कटने पर मतदान में बाधा, जनप्रतिनिधित्व कानून में संशोधन जरूरी
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