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अशोक सिंघल का जीवन राष्ट्र और समाज के लिए एक निष्काम कर्मयोगी का आदर्श प्रस्तुत करता है। उन्होंने अपना पूरा जीवन भारत के आत्मगौरव और स्वबोध को जगाने में समर्पित कर दिया। विद्यार्थी जीवन में ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए सिंघल को प्रो. राजेंद्र सिंह ‘रज्जू भैया’ और पूज्य गुरुजी जैसे महानुभावों का मार्गदर्शन मिला। इंजीनियरिंग की शिक्षा पूर्ण करने के बाद वे संघ के प्रचारक बन गए और उन्हें भाऊराव देवरस ने एक कुशल शिल्पी की भांति संवारा। उन्होंने व्यक्तिगत जीवन की संभावनाओं को त्यागकर राष्ट्रकार्य को चुना, और उनके लिए संगठन साधन था, समाज साध्य और राष्ट्रसेवा जीवन का उद्देश्य। राम जन्मभूमि आंदोलन के प्रमुख नेतृत्वकर्ता के रूप में अशोक सिंघल की पहचान बनी, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र इससे कहीं व्यापक था। रामसेतु की रक्षा, अमरनाथ यात्रा, गो-अनुसंधान, सामाजिक समरसता, प्रबुद्ध वर्ग को हिंदू चिंतन से जोड़ना और विभिन्न राष्ट्रीय विषयों पर जनजागरण जैसे अनेक क्षेत्रों में उनकी पहल और मार्गदर्शन उल्लेखनीय रहे। 1990 की कारसेवा के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों और कार्यकर्ताओं के बलिदान ने आंदोलन को एक निर्णायक मोड़ दिया, जिसमें उनकी भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। सामाजिक समरसता के प्रणेता के तौर पर, सिंघल ने अस्पृश्यता जैसी गंभीर सामाजिक चुनौती को समाप्त करने के लिए अथक प्रयास किए। उन्होंने पूज्य संतों से यह संदेश देने का आग्रह किया कि अस्पृश्यता हिंदू धर्म के मूल आदर्शों के अनुरूप नहीं है।
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