जीत की व्यापक परिभाषा देने वाले आलोचकों का कहना है कि जब सीमारेखा विवादित हो तब ज़मीनी लड़ाई पहला विकल्प बन जाती है और ‘फौजी जूते ज़मीन पर’ उतरते हैं तब अंतिम फैसला होता है।
युद्ध में जीत का पैमाना सिर्फ ज़मीन पर कब्ज़ा है, यह सोच भारतीय सैन्य रणनीति को सीमित करती है। चीफ ऑफ द आर्मी स्टाफ जनरल धीरज सेठ ने एनडीटीवी डिफेंस समिट में इस सोच को सामने रखा, जिसकी संस्थागत जड़ें गहरी हैं। इस विचार के अनुसार, युद्ध में जीत का ठोस पैमाना ज़मीन जीतना माना जाता है, जिसे देखा जा सकता है, फोटो खींची जा सकती है और जिसका राजनीतिक महत्व होता है। हालांकि, यह परिभाषा इतिहास और रणनीति, दोनों के नजरिए से अधूरी है। जीत असल में एक राजनीतिक नतीजा है, जिसे पहले से तय लक्ष्यों के आधार पर मापा जाता है, न कि नक्शे पर बनाए गए स्कोर से। भारतीय सेना का रिकॉर्ड बताता है कि वह तमाम लड़ाइयों में अपनी सीमा का विस्तार करने की जगह अपनी सीमा को बहाल करने या उसकी रक्षा करने पर ही जोर देती रही है। यह सोच उस लचीलेपन को सीमित करती है जो सीमित लड़ाइयों और सीमित लक्ष्यों वाली लड़ाइयों में भारत के काम आता रहा है। इस कारण, राष्ट्रीय सुरक्षा नीति को पूरी आज़ादी होनी चाहिए कि वह क्या चुने, न कि केवल एक संकीर्ण कसौटी से बंधी रहे। 1965 की लड़ाई इसका एक उदाहरण है। भारतीय सेना ने पाकिस्तान की करीब 1,840 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया था, जबकि पाकिस्तान ने भारत की करीब 540 वर्ग किलोमीटर ज़मीन पर कब्ज़ा किया था। ताशकंद समझौते के तहत दोनों पक्षों को 5 अगस्त 1965 वाली स्थिति में लौटना पड़ा। अगर सिर्फ ज़मीन को पैमाना माना जाए तो भारत को हर बार राजनीतिक दबाव में बल प्रयोग करते समय ज़मीन पर कब्ज़ा करने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। यह हार वास्तविक थी और भारत ने इसे अपनी हार या नाकामी माना, लेकिन इसके बाद 1967 में नाथू ला और चो ला में हुई झड़पों में भारतीय सेना डटी रही और उसने चीनी सेना को नुकसान भी पहुंचाया। इस लड़ाई में ज़मीन की अदला-बदली नहीं हुई, लेकिन भारत ने इसे अपनी जीत बताया। 1999 में हुआ कारगिल युद्ध इसका एक और साफ उदाहरण है। पाकिस्तानी सेना ने एलओसी के आसपास भारतीय ठिकानों पर कब्ज़ा कर लिया था। भारत ने हर चोटी पर वापस कब्ज़ा कर लिया। इस जीत में काफी खून और पैसा खर्च हुआ, फिर भी यह जीत थी। इस ऑपरेशन की सफलता इस बात को स्वीकार करने को दिखाती है कि जीत का मतलब है राजनीतिक मकसद को उचित कीमत देकर हासिल करना, न कि कई एकड़ ज़मीन पर कब्ज़ा करना जिसे हमेशा के लिए फौजी छावनी बनाकर रखना पड़े। इस ऑपरेशन में किसी ज़मीन पर कब्ज़ा नहीं किया गया, इसलिए इसे जीत घोषित न करना अनुचित होगा। मई 2025 में ऑपरेशन सिंदूर इस अंतर को और साफ करता है। घोषित लक्ष्य ज़मीन पर कब्ज़ा करना नहीं, बल्कि आतंकी ढांचे को निशाना बनाना था। पाकिस्तान का पूर्वी हिस्सा उससे अलग हो गया और शरणार्थी लौट गए।

