अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमेरिका के दोहरे मापदंड और राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के अहंकारपूर्ण रवैये के कारण वैश्विक अस्थिरता बढ़ रही है। ट्रंप का अहंकार इस हद तक पहुंच गया है कि मानवीय मूल्य जैसे नैतिकता, पारस्परिकता और समानता बेमानी हो गई है। इसका ताजा प्रमाण मध्यावधि चुनावों में हार के बाद भी उनके रवैये में कोई बदलाव न आना है। यदि यह रवैया नहीं बदला तो विश्व और अधिक अस्थिर हो सकता है। अमेरिका और नाटो यूक्रेन-रूस युद्ध में यूक्रेन की सहायता कर रहे हैं, जबकि यूरोप रूस से गैस खरीद रहा है। ट्रंप को इससे कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन भारत के रूस से तेल खरीदने पर उन्होंने कड़े प्रतिबंधों की धमकी दी और भारत को अपमानित करने का प्रयास किया। होर्मुज जलमार्ग में यातायात बाधित होने से कई देश आर्थिक तंगी झेल रहे हैं, लेकिन अमेरिका को इसकी चिंता नहीं। यह दोमुंही राजनीति इस कदर बढ़ गई है कि ट्रंप स्वयं रूस से डीजल खरीद रहे हैं, जबकि भारत पर रूस को युद्ध में हथियार खरीदने में मदद करने का आरोप लगाया जाता है। अमेरिका खुद को सबसे पुराना लोकतंत्र और श्रेष्ठतम राष्ट्र मानकर निरंकुश वैश्विक जमींदार बनने की जुगत में लगा है। ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिकी प्रशासन का अहंकार और बढ़ा है। जनवरी में ट्रंप के आदेश पर वेनेजुएला के राष्ट्रपति और उनकी पत्नी को उनके घर से उठाकर अमेरिकी जेल में डाल दिया गया। वैश्विक नियमों के इस नग्न उल्लंघन की किसी देश ने खुलकर निंदा तक नहीं की, और संयुक्त राष्ट्र तथा सुरक्षा परिषद भी शांत रहे। अमेरिका ने वियतनाम, इराक, लीबिया जैसे देशों में भी ऐसे ही अनैतिक आक्रमण किए हैं, जिनमें उसे मुंह की खानी पड़ी, पर उसकी अहंकारवादी नीतियों में कोई अंतर नहीं आया। राष्ट्रों के बीच संबंधों और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के कामकाज में छल-बल से दूसरों पर हावी होने की प्रवृत्ति स्पष्ट देखी जा सकती है।
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ट्रंप का अहंकार वैश्विक अस्थिरता का कारण
6 नवंबर 2026 को 11:08 pm बजे
