अंततः, इतिहास वह है जो हम सामूहिक रूप से बनाते हैं और साझा करते हैं।
इतिहास का स्वामित्व केवल लिखित दस्तावेजों का नहीं है, बल्कि यह उन अनगिनत लोगों की स्मृतियों, कहानियों और परंपराओं में भी जीवित रहता है जिन्होंने अपने जीवन को अपने तरीके से जिया। यह एक ऐसी सच्चाई है जिसे आधुनिक इतिहास-लेखन की शुरुआत से ही पहचानना आवश्यक था, लेकिन कई बार इसे अनदेखा भी किया गया। इतिहास कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिस पर कोई राष्ट्र, समुदाय, विचारधारा या पेशेवर इतिहासकारों का समूह एकाधिकार जमा सके। यह सबके लिए खुला है, फिर भी सवाल उठता है कि जब कोई इसका मालिक नहीं है, तो यह तय कौन करेगा कि कौन सा इतिहास महत्वपूर्ण है, कौन से साक्ष्य मान्य हैं, और किस संस्करण को शिक्षा, विद्वत्ता और सार्वजनिक मान्यता का अधिकार मिलेगा। यह सवाल भारत जैसे देश के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहाँ हमारी आधुनिक शिक्षा प्रणाली, जिसमें इतिहास का अकादमिक अध्ययन भी शामिल है, काफी हद तक औपनिवेशिक काल में निर्मित संस्थागत ढांचे के भीतर विकसित हुई है। शुरुआती दौर में, इतिहास को समझने और लिखने के लिए एक खास तरह की व्यवस्था बनाई गई थी। विश्वविद्यालय के विभाग, पाठ्यपुस्तकें, परीक्षाएं और पेशेवर शोध मिलकर ज्ञान का एक विशेष ढाँचा तैयार करते थे। इस प्रक्रिया में, लिखित रिकॉर्ड को अत्यधिक महत्व दिया गया। इतिहासकार को प्रशिक्षित किया गया कि वह स्मृतियों, किंवदंतियों और सुनी-सुनाई बातों से ऊपर उठकर, दस्तावेज़ों से प्राप्त साक्ष्यों और सत्यापित इतिहास के बीच अंतर कर सके। एक ज़िला मजिस्ट्रेट इसलिए रिकॉर्ड छोड़ता है क्योंकि प्रशासनिक व्यवस्था उससे लिखने की अपेक्षा करती है। इसी तरह, एक अदालत फ़ाइलें बनाती है क्योंकि कानून दस्तावेज़ीकरण के माध्यम से ही संचालित होता है। ये सभी लिखित स्रोत, जैसे कि सरकारी दस्तावेज़, अदालत के कागज़ात और जनगणना के रिकॉर्ड, 'ठोस' साक्ष्य माने जाते थे, जबकि लोगों की यादें और स्थानीय समझ को सहायक माना जाता था। इस अनुशासन का एक बहुत अच्छा कारण था। इसने ऐतिहासिक तर्कों और केवल दावों के बीच एक आवश्यक अंतर प्रदान किया। यह एक ऐसी उपलब्धि थी जिसने आधुनिक इतिहास-लेखन को एक ठोस आधार दिया। स्रोतों का उत्पादन, उनकी जांच और आलोचना आवश्यक थी, और ऐतिहासिक तर्कों को हमेशा जांच के दायरे में रहना चाहिए। एक इतिहासकार केवल इसलिए किसी घटना के घटित होने का दावा नहीं कर सकता क्योंकि कोई समुदाय ऐसा मानता है, कोई राजनीतिक कारण इसकी मांग करता है, या क्योंकि कोई आकर्षक कहानी पीढ़ियों से दोहराई जा रही है। लेकिन यहीं से एक और मुश्किल सवाल पैदा होता है। क्या होता है उन लोगों का, जिनके पास ऐसे रिकॉर्ड बनाने के लिए न तो अधिकार था, न ही साक्षरता, न ही संस्थागत साधन? उनका इतिहास कहाँ दर्ज होता है?
