लोकतंत्र में वोटर लिस्ट को पारदर्शी और विश्वसनीय बनाए रखना एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है, लेकिन जब इस प्रक्रिया में शिक्षकों को झोंक दिया जाता है, तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम सवालों के घेरे में आ जाता है। देश भर में वोटर लिस्टों में सुधार के लिए चलाए जा रहे स्पेशल इंटेंसिव रिविजन (एसआईआर) के काम को लेकर अब प्रशासनिक और राजनीतिक कारणों से कड़ी जांच हो रही है। यह कार्य लोकतंत्र में पारदर्शिता के लिए आवश्यक है, जिसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी योग्य मतदाता वोट देने के अधिकार से वंचित न रह जाए। हालांकि, इस प्रक्रिया के दौरान शिक्षकों पर पड़ने वाले अतिरिक्त बोझ और उससे छात्रों की पढ़ाई पर हो रहे प्रतिकूल असर ने इस कवायद को जटिल बना दिया है। महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों से भी ऐसी ही व्यवधान की खबरें आ रही हैं, जहाँ शिक्षकों की व्यस्तता के कारण स्कूलों में नियमित कक्षाएं प्रभावित हुई हैं। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि देश के सरकारी स्कूल पहले से ही अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। शिक्षा की गुणवत्ता और पर्याप्त शिक्षकों के अभाव में छात्रों के दाखिले प्रभावित हो रहे हैं। ऐसे में, बड़ी संख्या में बूथ लेवल ऑफिसर (बीएलओ) के रूप में सरकारी स्कूलों के शिक्षकों की तैनाती ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। शिक्षक अपना काफी समय वोटर वेरिफिकेशन, मीटिंग और आंकड़े जुटाने जैसे कामों में लगा रहे हैं। मुंबई के एक स्कूल के 34 में से 24 शिक्षकों के बीएलओ ड्यूटी पर होने की बात सामने आई है। यह स्थिति 'शिक्षा के अधिकार अधिनियम' की धारा 27 का उल्लंघन करती है, जो शिक्षकों को पढ़ाई-लिखाई के अलावा अन्य कामों में लगाने से रोकती है, सिवाय कुछ खास परिस्थितियों के। इस व्यवधान का सीधा असर छात्रों की पढ़ाई पर पड़ रहा है।
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वोटर लिस्ट में सुधार जरूरी, पर शिक्षकों की पढ़ाई से समझौता नहीं: हाईकोर्ट और चुनाव आयोग के निर्देश
5 अक्टूबर 2026 को 12:05 am बजे
