सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को वापस लेने की अनुमति देने का अधिकार अब हाई कोर्ट के पास रहेगा। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की युगलपीठ ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिसंबर 2025 में जारी दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए यह स्थिति स्पष्ट की है। मुख्य न्यायाधीश अल्पेश यशवंत कोगजे और न्यायमूर्ति विवेक जैन की युगलपीठ ने मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को तय की है। सुनवाई के दौरान राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता बीडी सिंह ने युगलपीठ को बताया कि एमपी-एमएलए विशेष अदालत में लंबित 17 प्रकरणों में अभियोजन वापसी की अनुमति के लिए आवेदन प्रस्तुत किए गए हैं, जिन पर सुनवाई लंबित है। दरअसल, सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों की निगरानी के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट को जनहित याचिकाओं के माध्यम से निगरानी रखने के निर्देश दिए थे। इसी क्रम में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में भी एक संज्ञान याचिका पर सुनवाई चल रही है। पिछली सुनवाई के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत अभियोजन वापसी की अनुमति देने के अधिकार क्षेत्र का प्रश्न उठा था। सवाल यह था कि क्या एमपी-एमएलए विशेष अदालत स्वयं अभियोजन वापसी की अनुमति दे सकती है, या इसके लिए हाई कोर्ट की पूर्व अनुमति आवश्यक होगी। राज्य शासन की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता बीडी सिंह ने सुप्रीम कोर्ट के दिसंबर 2025 के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए तर्क दिया कि जनप्रतिनिधियों के खिलाफ आपराधिक मामलों में अभियोजन वापसी के आवेदन का परीक्षण करने और अनुमति देने का पूरा अधिकार हाई कोर्ट के पास है। उन्होंने युगलपीठ को बताया कि एमपी-एमएलए विशेष अदालत में लंबित 17 प्रकरणों में अभियोजन वापसी की अनुमति के लिए आवेदन प्रस्तुत किए गए हैं।
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एमपी-एमएलए के मुकदमे वापस लेने की अर्जी पर हाई कोर्ट करेगा फैसला
6 नवंबर 2026 को 11:08 pm बजे

एमपी-एमएलए के मुकदमे वापस लेने की अर्जी पर हाई कोर्ट करेगा फैसला
