लंदन और बीजिंग के उदाहरण दिखाते हैं कि सख्त नियम लाते हैं सुधार
दिल्ली-एनसीआर की हवा में घुलता जहर अब किसी एक मौसम की समस्या बनकर नहीं रह गया है। सर्दियां आते ही दमघोंटू हवा, धुंध की चादर और खतरनाक स्तर पर पहुंचा एक्यूआइ का आंकड़ा लोगों को डराने लगता है। इस दौरान सरकारें कुछ दिनों के लिए सक्रिय होती हैं, कई बैठकें होती हैं, निर्माण कार्यों पर रोक लगती है और वाहनों के लिए पाबंदियां घोषित की जाती हैं। लेकिन जैसे ही मौसम बदलता है, प्रदूषण का मुद्दा भी पीछे छूट जाता है। सवाल यह है कि क्या करोड़ों लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ी इस गंभीर समस्या का समाधान केवल अस्थायी प्रतिबंधों से संभव है? असल में, दिल्ली-एनसीआर सहित उत्तर भारत के कई राज्यों में प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए एक दीर्घकालिक और समग्र नीति की तत्काल आवश्यकता है। दुनिया भर के कई शहरों ने वायु प्रदूषण की इस चुनौती से सफलतापूर्वक निपटा है। लंदन का उदाहरण देखें, जहाँ अल्ट्रा लो इमिशन जोन (यूएलईजेड) लागू किया गया। इसके तहत पुराने और अधिक प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों के शहर में प्रवेश पर शुल्क लगाया गया। इस कड़े कदम के परिणामस्वरूप 2024 में नाइट्रोजन डाइऑक्साइड का स्तर पहले की तुलना में 27 प्रतिशत तक कम हो गया। इसी तरह, बीजिंग ने भी कोयले के इस्तेमाल में कटौती, उद्योगों पर कड़ा नियंत्रण, स्वच्छ ईंधन को बढ़ावा देने, वाहनों के उत्सर्जन मानकों को सख्त करने और सार्वजनिक परिवहन को प्रोत्साहित करने जैसे प्रभावी उपाय अपनाए। इन ठोस कदमों से बीजिंग में प्रदूषण के स्तर में 35 प्रतिशत तक की महत्वपूर्ण कमी आई है। ये अंतरराष्ट्रीय उदाहरण स्पष्ट रूप से दर्शाते हैं कि वायु प्रदूषण का मुकाबला केवल राजनीतिक इच्छाशक्ति, निरंतर निगरानी और नियमों के सख्त क्रियान्वयन से ही संभव है। दिल्ली के संदर्भ में, सबसे पहली और सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को इतना मजबूत और सुविधाजनक बनाना है कि आम नागरिक निजी वाहनों के बजाय बस और मेट्रो जैसी सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का उपयोग करना पसंद करें। इसके साथ ही, साइकिल चलाने वालों के लिए सुरक्षित साइकिलिंग ट्रैक और पैदल चलने वालों के लिए सुगम फुटपाथ विकसित करने की भी जरूरत है। इलेक्ट्रिक बसों और अन्य सार्वजनिक वाहनों को बड़े पैमाने पर प्रोत्साहन देना भी अत्यंत आवश्यक है। यह समझना महत्वपूर्ण है कि निजी वाहनों पर निर्भरता कम किए बिना केवल पुराने वाहनों पर प्रतिबंध लगाने जैसे उपायों से अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं किए जा सकते। समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। चूंकि वायु प्रदूषण की समस्या केवल दिल्ली तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव हरियाणा, पंजाब, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे पड़ोसी राज्यों में भी व्यापक है, इसलिए इन सभी राज्यों के साथ मिलकर एक समन्वित क्षेत्रीय कार्ययोजना विकसित करना अनिवार्य है। अंतर-राज्यीय सहयोग के बिना इस समस्या का स्थायी समाधान संभव नहीं है। सरकारों के प्रयास तभी सफल हो सकते हैं जब नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी को समझें और सक्रिय रूप से सहयोग करें। छोटी दूरी के लिए भी निजी वाहनों का अनावश्यक उपयोग करने से बचना, कार पूलिंग को बढ़ावा देना, सार्वजनिक परिवहन का अधिक से अधिक इस्तेमाल करना और कचरा न जलाना जैसे नागरिक-स्तरीय कदम सामूहिक रूप से बड़ा सकारात्मक प्रभाव डाल सकते हैं। इन आदतों को अपनाना न केवल पर्यावरण के लिए हितकर है, बल्कि यह स्वस्थ समाज के निर्माण में भी सहायक है। सबसे जरूरी बात यह है कि प्रदूषण नियंत्रण को केवल पर्यावरण विभाग का काम मानकर सीमित नहीं किया जाना चाहिए। इसे शहरी नियोजन, परिवहन, उद्योग और स्वास्थ्य नीति का एक अभिन्न अंग बनाया जाना चाहिए। इन सभी विभागों के बीच तालमेल और एकीकृत दृष्टिकोण ही प्रभावी समाधान की ओर ले जा सकता है। दैनिक आधार पर वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआइ) की निगरानी की जानी चाहिए ताकि स्थिति की गंभीरता का पता चल सके और समय पर कार्रवाई की जा सके।

