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मध्य प्रदेश में बेसहारा मवेशियों के कारण सड़कों पर होने वाले हादसों में मरने वालों की संख्या में चिंताजनक वृद्धि हुई है। पिछले साल 2025 की तुलना में इस साल अगस्त तक मौतों का आंकड़ा लगभग तीन गुना हो गया है। यह स्थिति तब है जब प्रदेश सरकार द्वारा सड़कों से मवेशियों को हटाने, उन्हें गोशालाओं तक पहुंचाने और इस समस्या से निपटने के लिए कई अभियान और समितियां वर्षों से चलाई जा रही हैं। इसके बावजूद, सड़कों पर मवेशियों की मौजूदगी और उनसे होने वाली दुर्घटनाओं के आंकड़े लगातार बढ़ रहे हैं, जो इन प्रयासों की प्रभावशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। जनवरी से अगस्त 2026 के बीच प्रदेश में मवेशियों से जुड़े हादसों में 437 लोगों की जान गई और 614 लोग घायल हुए। रात के समय सड़कों पर बैठे या घूमते मवेशी अक्सर वाहन चालकों को समय पर दिखाई नहीं देते, जिससे या तो सीधे वाहन उनसे टकरा जाते हैं या फिर उन्हें बचाने के प्रयास में चालक अपना नियंत्रण खो बैठते हैं। खराब दृश्यता वाले मार्ग और हाईवे पर यह जोखिम और भी अधिक बढ़ जाता है। आंकड़े बताते हैं कि 2025 में मवेशियों से जुड़े सड़कों पर हुए हादसों में कुल 719 लोगों की मौत हुई थी और 520 लोग घायल हुए थे। वहीं, इस साल अगस्त तक मौतों की संख्या बढ़कर 36 हो गई, जबकि 19 लोग घायल हो चुके हैं। जिलावार आंकड़ों पर गौर करें तो सतना और रायसेन सबसे ज्यादा प्रभावित जिलों में से हैं। अगस्त तक सतना में 57 और रायसेन में 46 लोगों की मौत मवेशियों से जुड़े हादसों में हुई है। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि सड़कों पर बेसहारा घूमते मवेशी केवल यातायात की समस्या नहीं हैं, बल्कि वे गंभीर सड़क़ सुरक्षा चुनौती बन चुके हैं। इंदौर जैसे शहरों में भी स्थिति चिंताजनक है। 2025 में इंदौर में मवेशियों से जुड़े हादसों में 13 मौतें और 27 घायल हुए थे। इस साल अगस्त तक यहां तीन मौतें और 14 घायल दर्ज किए गए हैं। जिलों के बीच आंकड़ों में यह अंतर यह भी बताता है कि समस्या का असर हर जगह एक जैसा नहीं है। वर्षों से मवेशियों को सड़कों से हटाने के लिए अभियान चलाए जा रहे हैं, समितियां गठित की गई हैं और उन्हें गोशालाओं तक पहुंचाने के प्रयास भी हो रहे हैं। यह स्थिति सड़क़ सुरक्षा के गंभीर मुद्दे को उजागर करती है।
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