देवास और खंडवा की वन उत्पादन शाखाओं द्वारा जिम्मेदारी लेने से इनकार करने के बाद इंदौर वनमंडल को पेड़ों की कटाई, ठूंठ हटाने और लकड़ियों को डिपो तक पहुंचाने का काम मिला है, जिसके लिए एजेंसी की तलाश जारी है
महू-खंडवा आमान परिवर्तन परियोजना पर सिंहस्थ 2028 से पहले काम पूरा करने का लक्ष्य है, लेकिन जंगल से गुजरने वाली रेल पटरियों के लिए पेड़ों की कटाई को लेकर वन विभाग के सामने एक नई बाधा आ खड़ी हुई है। इस परियोजना के तहत 156 किलोमीटर लंबे मार्ग पर छह प्रमुख स्थलों पर एक साथ काम करने पर जोर दिया जा रहा है। यह मीटरगेज रेल लाइन ब्राडगेज में बदली जा रही है, जिसके 454 हेक्टेयर जंगल क्षेत्र से गुजरने की योजना है। रेलवे प्रशासन वन एवं पर्यावरण संबंधी आवश्यक स्टेज-2 स्वीकृति की प्रक्रिया में है, लेकिन पेड़ों की कटाई और संबंधित कार्यों के लिए एजेंसी तय करने में थोड़ा समय लग रहा है, जिससे परियोजना की समय-सीमा प्रभावित हो सकती है। रेलवे लाइन के लिए बाधक बनने वाले पेड़ों की कटाई के बाद उनके ठूंठ हटाने और कटी हुई लकड़ी को डिपो तक पहुंचाने का काम अब इंदौर वनमंडल को सौंपा गया है। यह जिम्मेदारी इसलिए इंदौर वनमंडल को मिली है क्योंकि देवास और खंडवा की उत्पादन शाखाएं यह काम करने से मना कर रही हैं। नियमानुसार, पेड़ों की कटाई, ठूंठों को हटाने और लकड़ियों को डिपो तक पहुंचाने का काम वन विभाग की उत्पादन शाखा से ही कराया जाता है। इस स्थिति के कारण, पेड़ों की कटाई के बाद होने वाली सारी प्रक्रिया इंदौर वनमंडल को ही पूरी करनी होगी, जिसमें टेंडर प्रक्रिया और एजेंसी का चयन भी शामिल है। इंदौर वनमंडल को पेड़ों की कटाई के बाद लकड़ियों को डिपो तक पहुंचाने की जिम्मेदारी मिली है, क्योंकि देवास और खंडवा की उत्पादन शाखाएं इस काम को करने से इन्कार कर चुकी हैं। यह एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके लिए वनमंडल को एक एजेंसी नियुक्त करनी होगी। इस काम के लिए टेंडर निकाल दिए गए हैं, लेकिन एजेंसी तय करने में थोड़ा समय लग सकता है। संभवतः नवंबर के बाद ही पेड़ों को काटने का काम शुरू हो पाएगा, क्योंकि एजेंसी के चयन की प्रक्रिया अभी चल रही है। इस देरी का सीधा असर परियोजना की प्रगति पर पड़ने की आशंका है। इस परियोजना के लिए बड़ी संख्या में पेड़ प्रभावित होंगे। अलग-अलग स्तर पर करीब एक लाख 34 हजार पेड़ काटे जाने का अनुमान है। रेल मार्ग में 20 किलोमीटर के क्षेत्र में 16 छोटी सुरंगें भी बनाई जाएंगी। इसके अलावा, 30-30 मीटर लंबे वायडक्ट (पुल) भी बनाए जाएंगे, जिनका उद्देश्य 17 हजार पेड़ों को सुरक्षित रखना है। इन वायडक्ट्स के निर्माण से कुछ पेड़ों को बचाया जा सकेगा, लेकिन फिर भी बड़ी संख्या में पेड़ों को काटना आवश्यक होगा। परियोजना के तहत बाकी 12.1 किलोमीटर में 13 छोटी सुरंगें बनाई जाएंगी। इनमें बड़िया से बेका के बीच 4.1 किमी, चोरल से मुख्तियार बलवाड़ा के बीच 2.2 किमी और राजपुर के पास 1.6 किमी लंबी सुरंगें शामिल होंगी। इन सुरंगों के निर्माण से पहाड़ी और दुर्गम इलाकों से रेल लाइन बिछाना संभव हो पाएगा। इन सुरंगों का निर्माण कार्य परियोजना के लिए महत्वपूर्ण है और इसे समय पर पूरा करना आवश्यक है। वन विभाग की पहले की योजना थी कि निर्माण कार्य की जरूरत के अनुसार चरणबद्ध तरीके से पेड़ों की कटाई की जाए, ताकि एक साथ बड़े क्षेत्र में पर्यावरणीय नुकसान न हो। हालांकि, अब रेलवे ने 156 किलोमीटर के मार्ग पर छह प्रमुख साइट पर एक साथ काम करने पर जोर दिया है। इस बदलाव के कारण पेड़ों की कटाई की प्रक्रिया तेज करनी पड़ेगी, जिससे एक साथ अधिक संख्या में पेड़ों को काटना होगा। यह पर्यावरण की दृष्टि से चिंता का विषय है। पेड़ों की कटाई के बाद सामने आने वाली सबसे बड़ी परेशानी ठूंठों को हटाने और लकड़ियों को डिपो तक पहुंचाने की होगी। इस काम के लिए इंदौर वनमंडल ने टेंडर जारी किए हैं। एजेंसी तय होने के बाद ही यह काम शुरू किया जा सकेगा। इस प्रक्रिया में थोड़ा समय लग सकता है, जिससे परियोजना में देरी की आशंका बढ़ गई है। रेलवे प्रशासन चाहता है कि यह काम छह से आठ महीने में पूरा हो जाए, लेकिन टेंडर प्रक्रिया की वजह से इसमें विलंब हो रहा है।

