पूर्वी जर्मनी में अफ़्द की बड़ी जीत ने आप्रवासन पर बहस को तेज किया, कुशल प्रवासियों के लिए अनिश्चितता
जर्मनी में हालिया चुनावी नतीजों ने देश के आप्रवासन (माइग्रेशन) पर चल रही बहस को एक नया और तीखा मोड़ दिया है। पूर्वी जर्मनी के सैक्सोनी-अनहाल्ट और मेक्लेनबर्ग-वोर्पोमेर्न राज्यों में धुर दक्षिणपंथी 'ऑल्टरनेटिव फॉर जर्मनी' (अफ़्द) पार्टी की शानदार जीत ने न केवल चांसलर फ्रेडरिक मेर्ज़ की क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स को करारी हार दी, बल्कि देश की राजनीतिक हवा को भी प्रभावित किया है। यह जीत, जो 1945 के बाद से जर्मन धुर दक्षिणपंथ की पहली बड़ी सफलता है, इस बात का संकेत देती है कि आप्रवासन को लेकर देश में एक बड़ा वर्ग चिंतित है। अफ़्द ने आर्थिक ठहराव और सामाजिक असंतोष को भुनाते हुए आप्रवासन पर कड़े प्रतिबंधों की मांग की है। हालाँकि, पार्टी की बयानबाजी कुशल श्रमिकों के आप्रवासन और कल्याण प्रणालियों पर बोझ डालने वाले अनियमित आप्रवासन के बीच अंतर करती है। यह विभाजन जर्मनी के लिए एक जटिल चुनौती पेश करता है, खासकर तब जब देश जनसांख्यिकीय चुनौतियों से जूझ रहा है। जर्मनी को अपनी अर्थव्यवस्था को बनाए रखने और बढ़ती उम्र की आबादी, बड़े पैमाने पर सेवानिवृत्ति और घटती जन्म दर से निपटने के लिए कुशल श्रमिकों की सख्त जरूरत है। इस कमी को पूरा करने के लिए, भारत जैसे देशों से कुशल पेशेवरों का आगमन जर्मनी के लिए महत्वपूर्ण है। 2022 में भारत और जर्मनी के बीच हुए 'प्रवासन और गतिशीलता भागीदारी समझौते' (एमएमपीए) के तहत, योग्य भारतीय पेशेवरों के लिए हर साल 3,000 नौकरी चाहने वाले वीज़ा प्रदान किए जाते हैं। यह समझौता छात्रों और पेशेवरों के लिए दो-तरफ़ा गतिशीलता को सुविधाजनक बनाने के लिए बनाया गया था, जो दोनों देशों के बीच संबंधों को मजबूत करता है। 2015 में जहाँ जर्मनी में भारतीय नागरिकों की संख्या 86,000 थी, वहीं 2025 तक यह बढ़कर 280,000 होने का अनुमान है। जर्मन इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल एंड सिक्योरिटी अफेयर्स ने भारत को 'श्रम और शिक्षा आप्रवासन के लिए उत्पत्ति का सबसे महत्वपूर्ण देश' बताया है। वर्तमान में, लगभग 138,000 भारतीय जर्मनी में एसटीईएम क्षेत्रों, आईटी और स्वास्थ्य सेवा जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम कर रहे हैं, जहाँ श्रमिकों की भारी कमी है। ये पेशेवर जर्मन अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हैं और देश के नवाचार और अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र को भी बढ़ावा देते हैं, खासकर डिजिटलीकरण और एआई जैसे डोमेन में। इन्दो-गेर्मन संबंध द्विपक्षीय स्तर पर बढ़ रहे हैं, और कुशल पेशेवरों की गतिशीलता दोनों देशों को जोड़ने वाले एक पुल का काम करती है। हालांकि, अफ़्द की बढ़ती लोकप्रियता और उनके कड़े आप्रवासन विरोधी रुख से जर्मनी की आकर्षण क्षमता पर सवाल उठने लगे हैं। धुर दक्षिणपंथ की विचारधारा सार्वजनिक सेवाओं, पुलिसिंग और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में एक असहज माहौल बना सकती है, जहाँ बाहरी लक्षणों जैसे त्वचा के रंग के आधार पर पूर्वाग्रह पनप सकते हैं। 2019 से 2023 के बीच जर्मनी में घृणा अपराध दोगुने हो गए हैं, जो आप्रवासन को लेकर राजनीतिक माहौल के सख्त होने का संकेत देते हैं।

