निर्मला सीतारमण ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक बैठक में चिंता जताई
चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा 2025-26 में 112 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। आंकड़ा केवल आयात और निर्यात के बीच का अंतर नहीं दिखाता, बल्कि आर्थिक स्थिरता, औद्योगिक क्षमता और रणनीतिक संप्रभुता पर बढ़ते दबाव का संकेत देता है। हाल में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक की बैठक में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि भारत इस चुनौती का सामना कर रहा है। अब जरूरत तात्कालिक प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर ऐसी नीति की है, जो घरेलू उत्पादन और व्यापारिक संतुलन दोनों को मजबूत करे। भारत का चीन के साथ व्यापार घाटा वित्त वर्ष 2015-16 के 52.5 अरब डॉलर से बढ़कर 2025-26 में 112 अरब डॉलर हो गया। यानी दस वर्षों में यह दोगुने से अधिक हुआ। चीन को भारत का निर्यात बढ़ा है, लेकिन वहां से आने वाले आयात की बड़ी मात्रा ने घाटे को लगातार विस्तृत किया है। इस बदलाव का अर्थ है कि निर्यात में सुधार के बावजूद आयात निर्भरता कम नहीं हुई। व्यापारिक संबंधों का यह असंतुलन अब व्यापक औद्योगिक नीति का विषय बन चुका है। असंतुलन का एक बड़ा कारण चीन की गैर-शुल्क बाधाएं हैं। निर्मला सीतारमण के अनुसार, चीनी प्रशासन के तकनीकी, स्वास्थ्य और गुणवत्ता संबंधी जटिल मानक भारतीय वस्तुओं के वहां के बाजार में प्रवेश को रोकते हैं। भारत एक दशक से अधिक समय से अपनी जेनेरिक दवाओं, प्रसंस्कृत मांस और कृषि उत्पादों के लिए उचित बाजार पहुंच मांगता रहा है। दूसरी ओर, चीन घरेलू उद्योगों को संरक्षण देने वाले जटिल नियम लागू करता है। इन नियमों का असर भारतीय निर्यातकों की प्रतिस्पर्धा पर पड़ता है। प्रतिस्पर्धी कीमत और गुणवत्ता होने के बावजूद भारतीय कंपनियां चीनी बाजार में अपनी जगह नहीं बना पातीं। चीन की मुद्रा युआन में उतार-चढ़ाव भी भारतीय रुपये पर दबाव बढ़ाता है। इस तरह व्यापार घाटा केवल सीमा शुल्क या वस्तुओं की कीमत का परिणाम नहीं है; बाजार पहुंच, नियामकीय शर्तें और मुद्रा संबंधी बदलाव भी इसके स्वरूप को प्रभावित करते हैं। भारत की घरेलू विनिर्माण वृद्धि के बावजूद चीनी कच्चे माल और घटकों पर निर्भरता बनी हुई है। इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग, डिस्प्ले पैनल, सौर पीवी सेल, औषधीय कच्चा माल यानी सक्रिय औषधीय संघटक और भारी औद्योगिक मशीनरी के लिए चीन से आयात जरूरी बना हुआ है। यही कारण है कि भारत में उत्पादन बढ़ने के साथ चीनी कलपुर्जों का आयात भी बढ़ता है। मेक इन इंडिया की सफलता के लिए अंतिम उत्पाद के साथ घटक निर्माण भी जरूरी है। चीन ने दुर्लभ मृदा तत्वों, लिथियम और आधुनिक उर्वरकों के उत्पादन तथा निर्यात पर नियंत्रण कायम कर रखा है। ये संसाधन भारत के इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योग, विद्युत वाहनों, सौर ऊर्जा और कृषि क्षेत्र के लिए जरूरी हैं। सीमित आपूर्ति और ऊंची कीमतों के कारण भारत को हर साल बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है। हरित प्रौद्योगिकी के विस्तार के दौर में ऐसी निर्भरता औद्योगिक योजना का अहम प्रश्न बन जाती है। भारत के सामने केवल जवाबी सीमा शुल्क लगाने का विकल्प पर्याप्त नहीं है। दीर्घकालिक समाधान के लिए इलेक्ट्रॉनिक्स और सेमीकंडक्टर का घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना होगा। अंतिम उत्पादों की असेंबली से आगे बढ़कर प्रिंटेड सर्किट बोर्ड, उन्नत सेंसर, डिस्प्ले पैनल और सेमीकंडक्टर चिप्स का देश में उत्पादन बढ़ाना होगा। इन घटकों के बिना चीन पर निर्भरता घटाने की कोशिश अधूरी रहेगी। दवा उद्योग में आत्मनिर्भरता दूसरी बड़ी प्राथमिकता है। भारत को दुनिया की फार्मेसी कहा जाता है, लेकिन उसका औषधि क्षेत्र सक्रिय औषधीय संघटकों के लिए 70 प्रतिशत तक चीन पर निर्भर है। यह निर्भरता रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े जोखिम पैदा करती है। देश में घोषित बल्क ड्रग पार्कों की स्थापना तेज करने और 41 महत्वपूर्ण सक्रिय औषधीय संघटकों के घरेलू उत्पादन के लिए प्रोत्साहन योजनाएं लागू करने की जरूरत है। भारतीय उद्योग को चीन की गैर-शुल्क बाधाओं का सामना कूटनीतिक प्रयासों और घरेलू गुणवत्ता व्यवस्था, दोनों से करना होगा। गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों के जरिये अमानक चीनी सामान की डंपिंग रोकने के लिए स्पष्ट मानक तय किए जा सकते हैं। ऐसे मानक घरेलू विनिर्माताओं को प्रतिस्पर्धा का उचित माहौल देंगे, बशर्ते उनका इस्तेमाल पारदर्शी और समान नियमों के तहत हो। आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाना भी रणनीति का अनिवार्य हिस्सा है। भारत को महत्वपूर्ण खनिजों, दुर्लभ धातुओं और उच्च तकनीकी उत्पादों के लिए समान विचारधारा वाले देशों के साथ वैकल्पिक आपूर्ति नेटवर्क तैयार करने होंगे। मित्र देशों से जुड़ी आपूर्ति व्यवस्था चीन पर एकतरफा निर्भरता घटा सकती है। इसके लिए व्यापार, कूटनीति और घरेलू क्षमता निर्माण को एक ही नीति ढांचे में जोड़ना होगा। हरित प्रौद्योगिकी और विद्युत वाहनों का विस्तार इस चुनौती को और स्पष्ट करता है। जीवाश्म ईंधन के लिए पश्चिम एशिया पर निर्भरता घटने के बाद यदि घरेलू निर्माण पर्याप्त नहीं बढ़ा, तो चीन से हरित प्रौद्योगिकी के आयात पर निर्भरता बढ़ सकती है। ऊर्जा संक्रमण तभी टिकाऊ होगा, जब उसके लिए जरूरी उपकरण, कलपुर्जे और तकनीकी क्षमता देश में भी विकसित हों। व्यापार घाटे को घटाने की दिशा में घरेलू वस्तुओं की खरीद को प्राथमिकता देनी होगी। उद्योग और कारोबार में शोध तथा नवाचार के लिए संसाधन बढ़ाने, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाओं का पारदर्शी और समयबद्ध क्रियान्वयन सुनिश्चित करने और गुणवत्ता मानकों का पालन कराने की जरूरत है। घरेलू मांग को उत्पादन क्षमता से जोड़ना ही आयात निर्भरता घटाने का व्यावहारिक रास्ता है। भारत को चीन को आर्थिक प्रतिस्पर्धी मानकर मुकाबले की तैयारी करनी होगी। इसके लिए व्यापारिक साझेदारों का विविधीकरण, घटक निर्माण, दवा क्षेत्र की आत्मनिर्भरता और वैकल्पिक आपूर्ति नेटवर्क साथ-साथ आगे बढ़ाने होंगे। 2025-26 का 112 अरब डॉलर का घाटा बताता है कि समस्या तत्काल समाप्त होने वाली नहीं है। चरणबद्ध औद्योगिक क्षमता निर्माण और 41 महत्वपूर्ण सक्रिय औषधीय संघटकों के घरेलू उत्पादन जैसी पहलों से ही भारत अपनी आर्थिक निर्भरता कम कर सकेगा।
