मध्य प्रदेश में स्मार्ट मीटर आमजन को महंगा पड़ रहा है। अनियमित वोल्टेज या अन्य दिक्कत से मीटर जलने पर उपभोक्ता से 5500 रुपए तक बर्न चार्ज लिया जाता है, जबकि यदि मीटर को कहीं शिफ्ट करना हो और उसकी बाहरी सील टूट जाती है तो रीसिल शुल्क 400 रुपए है। जिले में अब तक चार लाख से अधिक स्मार्ट मीटर लग गए है। 60 हजार उपभोक्ता ऐसे हैं, जिनके यहां दो साल पहले ही ये मीटर लग चुके थे
मध्य प्रदेश में आम उपभोक्ताओं के लिए स्मार्ट मीटर एक महंगा सौदा साबित हो रहा है। अनियमित वोल्टेज या अन्य तकनीकी दिक्कतों के कारण मीटर जलने पर उनसे 5500 रुपए तक का बर्न चार्ज वसूला जाता है। वहीं, यदि मीटर को कहीं शिफ्ट करने की आवश्यकता पड़ती है और उसकी बाहरी सील टूट जाती है, तो री-सील शुल्क के तौर पर 400 रुपए का भुगतान करना पड़ता है। जिले में अब तक चार लाख से अधिक स्मार्ट मीटर लगाए जा चुके हैं, जिनमें से 60 हजार ऐसे उपभोक्ता हैं जिनके घरों में ये मीटर दो साल पहले ही स्थापित हो गए थे। ये मीटर अत्यधिक संवेदनशील हैं और वोल्टेज में उतार-चढ़ाव या केबल फॉल्ट जैसी सामान्य समस्याओं से भी इनके टर्मिनल जल जाते हैं। मीटर बाहर से चालू प्रतीत हो सकता है, लेकिन यह घर के अंदर वोल्टेज की समस्या पैदा कर देता है। शिकायत मिलने पर बिजली कंपनियां ऐसे मामलों में बर्न चार्ज और सील टूटने पर री-सील चार्ज लगाती हैं, जिससे उपभोक्ताओं को अचानक ₹5000 से ₹6000 तक का अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ता है। स्मार्ट मीटर की स्थापना के बाद अब इस तरह के मामले सामने आने लगे हैं। भोपाल के राजहर्ष कॉलोनी निवासी जीएस सोलंकी के मीटर में कुछ समय पहले केबल जलने से फॉल्ट आ गया था, हालांकि उस वक्त मीटर काम कर रहा था। हाल ही में मीटर में फिर से गड़बड़ी पाई गई। जब उन्होंने कंपनी से शिकायत की, तो लाइन स्टाफ ने जांच के बाद ₹5000 का शुल्क बता दिया। अचानक इतनी बड़ी रकम का खर्च आने से उपभोक्ता काफी परेशान हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि अभी ऐसे कुछ ही मामले सामने आए हैं, लेकिन तीन से चार साल बाद जब ये मीटर अधिक पुराने हो जाएंगे, तब बड़ी संख्या में गड़बड़ियां सामने आएंगी और उपभोक्ताओं पर शुल्क का बोझ और भी बढ़ जाएगा। कंपनी की ओर से एक और कवायद की गई है, जिसके तहत स्मार्ट मीटर को भले ही उपभोक्ताओं को मुफ्त में लगाया गया हो, लेकिन इसे टैरिफ दरों से जोड़ दिया गया है। मौजूदा टैरिफ में ही स्मार्ट मीटर के नाम पर 155 करोड़ रुपए की राशि शामिल कर ली गई है। इसका मतलब है कि अब यह कंपनी के बिजली आपूर्ति का खर्च माना जा रहा है और इसे टैरिफ के माध्यम से वसूला जा रहा है। यह राशि सीधे तौर पर उपभोक्ताओं की जेब पर भारी पड़ रही है। उल्लेखनीय है कि ये स्मार्ट मीटर केंद्र सरकार की आइपीडीएस योजना के तहत लगाए गए हैं। इन मीटरों की संवेदनशीलता और इनसे जुड़े शुल्कों ने आम उपभोक्ताओं के लिए एक नई चिंता पैदा कर दी है।

