पंजाब में 'वृक्ष संरक्षण अधिनियम 2026' के तहत पेड़ों की कटाई को नियंत्रित करने के लिए जो नया कानून लाया गया है, वह अपनी ही मंशा पर भारी पड़ता दिख रहा है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने इसे 'बेहद कठोर' करार दिया है, जबकि पेड़ों की बिना रोक-टोक कटाई पर अंकुश लगाने की मांग कर रही कई जनहित याचिकाएं (पीआईएल) अदालतों में विचाराधीन हैं। पेड़ों को बचाने के लिए कानूनी सहारा लेना सराहनीय है, पर इस नए कानून की सबसे बड़ी खामी इसके 'पेड़' की परिभाषा में छिपी है, जिस पर शायद याचिकाकर्ताओं का ध्यान नहीं गया। पंजाब सरकार ने इस अधिनियम के तहत यह व्यवस्था की है कि पेड़ों की कटाई परमिट के जरिए ही होगी और गैरकानूनी कटाई पर भारी जुर्माना लगाया जाएगा। मगर, इस व्यवस्था की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि 'पेड़' की परिभाषा कितनी सटीक और न्यायसंगत है। कानून के अनुसार, किसी भी लकड़ीदार पौधे को पेड़ तभी माना जाएगा जब उसका तना जमीन से कम 35 सेंटीमीटर मोटा हो। यह परिभाषा कागजों पर तो भले ही ठीक लगे, लेकिन पेड़ों की सुरक्षा के मूल उद्देश्य को पूरा करने में यह पूरी तरह विफल साबित हो रही है। कानून स्पष्ट रूप से कहता है कि 35 सेमी से कम मोटे तने वाले पौधे की कटाई के लिए किसी भी तरह की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि छोटे पौधों और नवोदित पेड़ों को भी इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। किसी भी पेड़ का तना 35 सेमी मोटा होने में आमतौर पर तीन से छह साल या उससे अधिक का समय लग जाता है, जो पेड़ की प्रजाति, मिट्टी की गुणवत्ता और वर्षा की उपलब्धता जैसे कारकों पर निर्भर करता है। इस प्रकार, यह परिभाषा युवा पेड़ों के लिए एक बड़े संकट का निर्माण करती है, जिससे कानून का मूल उद्देश्य ही खतरे में पड़ जाता है। यह स्थिति कानून को समस्या का ही एक हिस्सा बना देती है, बजाय इसके कि यह समाधान का अंग बने। हर साल, चाहे वह सरकारें हों, स्थानीय संगठन हों, नागरिक समाज समूह हों या आम जनता, सभी बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण के अभियान चलाते हैं। शहरों और गांवों में सड़कों और नहरों के किनारे लाखों पौधे लगाए जाते हैं। यह कार्य न केवल जनता के पैसे से संभव होता है, बल्कि लोग इसे एक उत्सव की तरह मनाते हैं। हालांकि, इन लाखों नव-रोपित पौधों को नए कानून के तहत कोई सुरक्षा प्राप्त नहीं होगी, क्योंकि वे 35 सेमी मोटे तने की न्यूनतम शर्त को पूरा नहीं करते। यह विडंबना ही है कि एक ओर जहां कानून पुराने, स्थापित पेड़ों की रक्षा का वादा करता है, वहीं दूसरी ओर यह नवोदित वनस्पति को असुरक्षित छोड़ देता है। इस प्रकार, यह कानून अपने ही घोषित लक्ष्य के विपरीत कार्य करता है। जब केवल बड़े पेड़ों को ही 'पेड़' की परिभाषा में शामिल किया जाएगा, तो छोटे और नए पौधों को मनमर्जी से काटने की छूट मिल जाएगी। कल्पना कीजिए कि कोई डेवलपर, ठेकेदार या स्थानीय निकाय यदि सड़क के किनारे किसी निर्माण कार्य या सड़क चौड़ीकरण के लिए दो साल के पौधे को हटाना चाहे, तो इस कानून के तहत उसे कोई अपराध नहीं माना जाएगा। अफसोस की बात यह है कि इन बेचारों पौधों को कानून की नजर में 'पेड़' का दर्जा ही नहीं मिलेगा। यहीं पर अदालतों को हस्तक्षेप करना चाहिए था। याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 21 के तहत स्वच्छ पर्यावरण के मौलिक अधिकार की रक्षा के लिए अनुच्छेद 226 के तहत अदालत का दरवाजा खटखटाया है, लेकिन उन्हें यह भी तर्क देना चाहिए था कि यह कानून मनमाना और अनुच्छेद 14 के तहत अनुचित है। यदि यह कानून पौधों को उनकी प्रारंभिक अवस्था में सुरक्षा प्रदान नहीं करता है, तो इसके घोषित उद्देश्य और इसके प्रावधानों के बीच कोई तार्किक संबंध नहीं रह जाता है। यदि लक्ष्य समग्र रूप से हरियाली की रक्षा करना और उसका विस्तार करना है, तो भविष्य में हरियाली का विस्तार करने वाले युवा पेड़ों की सुरक्षा न करना एक अतार्किक कार्य है। यह अत्यंत खेदजनक है कि याचिकाकर्ताओं ने इस मूल मुद्दे को नजरअंदाज कर दिया है और इसके बजाय परमिट जारी करने में देरी या पेड़ों की सुरक्षा में लगे कर्मचारियों की कमी जैसी द्वितीयक चिंताओं पर ध्यान केंद्रित किया है। 35 सेमी मोटे तने के मुद्दे को प्रमुखता से न उठाकर, याचिकाकर्ताओं ने एक बड़ी खामी को छोड़ दिया है, जिसके कारण भविष्य में लाखों पौधों को आसानी से काटा जा सकता है। यद्यपि अदालती आदेश बड़े पेड़ों की कटाई को रोकने में सक्षम हो सकते हैं, लेकिन पंजाब में भविष्य की हरियाली का विस्तार एक बड़े संकट का सामना कर रहा है। यह आवश्यक है कि 'पेड़' की इस परिभाषा को मनमाना और अनुचित बताते हुए एक उचित जनहित याचिका के माध्यम से इसे चुनौती दी जाए। कानून में ऐसे बदलावों की तत्काल आवश्यकता है जो न केवल बड़े पेड़ों की रक्षा करें, बल्कि सार्वजनिक वृक्षारोपण कार्यक्रमों, पूरक वनीकरण पहलों और हरित क्षेत्रों में लगाए गए पौधों और छोटे पेड़ों को भी सुरक्षा प्रदान करें। एक ऐसी परिभाषा तैयार की जानी चाहिए जो हर आकार और उम्र के पौधों को संरक्षण दे। इसके अतिरिक्त, जनहित याचिका में यह तर्क भी शामिल किया जाना चाहिए कि यह कानून 'जन विश्वास' के सिद्धांत के विरुद्ध है। जनता प्राकृतिक संसाधनों को सरकार को एक भरोसे के साथ सौंपती है, और यह भरोसा भविष्य के पर्यावरण की सुरक्षा पर भी लागू होता है, जो आज लगाए गए पौधों के अस्तित्व पर निर्भर करता है। जनहित याचिका में यह मांग भी की जानी चाहिए कि यह कानून पूरे ग्रामीण क्षेत्रों पर भी समान रूप से लागू हो। वर्तमान में, यह कानून पंजाब के कुल भौगोलिक क्षेत्र के केवल 4.2 फीसदी हिस्से पर ही लागू होता है, जो इसकी प्रभावशीलता को सीमित करता है। यह आवश्यक है कि अदालतें विधायिका को पेड़ की परिभाषा में संशोधन करने का आदेश दें, ताकि यह आधुनिक वन प्रबंधन और संरक्षण के सिद्धांतों के अनुरूप हो सके। आधुनिक वन प्रबंधन में, पेड़ों को उनके तने की मोटाई के बजाय उनके पारिस्थितिक महत्व और जमीन पर उनके योगदान के आधार पर परिभाषित किया जाता है। केवल तने की न्यूनतम मोटाई के आधार पर पेड़ों को परिभाषित करके, यह कानून अनजाने में उन लोगों को बढ़ावा देता है जो जमीन को खाली कराने के उद्देश्य से छोटे पेड़ों को उनके विकास के एक निश्चित आकार तक पहुंचने से पहले ही काटना चाहते हैं। यह उन लोगों के लिए एक खुला निमंत्रण जैसा है जो विकास के नाम पर हरियाली का बलिदान करने को तैयार हैं। पंजाब का पर्यावरण पहले से ही अत्यधिक नाजुक स्थिति में है। अत्यधिक खेती, अनियंत्रित विकास और तेजी से बढ़ता शहरीकरण राज्य के वन क्षेत्र को देश में सबसे निचले पायदान पर ले आया है। ऐसे में, 'पंजाब वृक्ष संरक्षण अधिनियम' जैसे कानून पर्यावरण के प्रति राज्य की बढ़ती संवेदनशीलता को दर्शाने के उद्देश्य से लाए गए थे। हालांकि, पेड़ों को उनके तने की न्यूनतम 35 सेमी की सीमा से परिभाषित करके, हमारे सुरक्षा कवच के भीतर एक बहुत बड़ा छेद छोड़ दिया गया है। जब तक जनहित याचिकाओं में कानून की इस मूल खामी को प्रमुखता से नहीं उठाया जाएगा, तब तक पंजाब में हर साल किए जाने वाले वृक्षारोपण के प्रयास व्यर्थ साबित होते रहेंगे। लाखों पौधे लगाए जाएंगे, लेकिन वे कानून की नजर में 'पेड़' नहीं माने जाएंगे और आसानी से काटे जा सकेंगे। यह एक ऐसी स्थिति है जो भविष्य में राज्य की हरियाली के लिए गंभीर खतरा पैदा करती है।
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पंजाब के वृक्ष संरक्षण अधिनियम में 35 सेमी की परिभाषा बनी चिंता का सबब
5 नवंबर 2026 को 10:58 pm बजे

पंजाब के वृक्ष संरक्षण अधिनियम में 35 सेमी की परिभाषा बनी चिंता का सबब
