सतगढ़ी औद्योगिक क्षेत्र में 20 लाख लीटर पानी पहुंचाने की योजना है
रोजाना 20 लाख लीटर पानी फैक्ट्रियों को मिलेगा, 11 किमी पाइपलाइन बिछेगी
यदि औद्योगिक क्षेत्रों में उपचारित पानी की आपूर्ति की यह योजना सफल होती है, तो एक ओर उद्योगों को पानी का एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक स्रोत मिलेगा, वहीं दूसरी ओर कीमती पेयजल की बचत भी हो सकेगी। सतगढ़ी क्षेत्र में प्रस्तावित ग्लोबल इन्वेस्टर्स समिट को देखते हुए औद्योगिक बुनियादी सुविधाओं के विकास पर विशेष जोर दिया जा रहा है। उपचारित पानी की आपूर्ति की यह व्यवस्था इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो सकती है। हालांकि, शहर में प्रतिदिन निकलने वाले 360 एमएलड़ी सीवेज में से करीब 156 एमएलड़ी पानी का उपचार अभी भी नहीं हो पा रहा है। ऐसे में सीवेज उपचार की क्षमता बढ़ाना और बिना साफ किए गंदे पानी को जल स्रोतों में मिलने से रोकना नगर निगम के सामने एक बड़ी चुनौती है।
भोपाल में अब उद्योगों को सीवेज से साफ किया हुआ पानी मिलेगा। नगर निगम ने कोलार के सतगढ़ी में बन रहे नए औद्योगिक क्षेत्र में रोजाना 20 लाख लीटर उपचारित पानी पहुंचाने की योजना बनाई है। इसके लिए करीब 11 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाने का प्रस्ताव है। इस पहल से उद्योगों में साफ पेयजल की खपत कम होगी और उपचारित पानी का बेहतर उपयोग हो सकेगा। यह योजना सनखेड़ी सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट से शुरू होगी, जहां से 20 लाख लीटर उपचारित पानी की आपूर्ति की जाएगी। भविष्य में इस व्यवस्था को गोविंदपुरा और मंडीदीप जैसे औद्योगिक क्षेत्रों तक भी पहुंचाने की योजना है। इससे फैक्ट्रियों को पानी का एक वैकल्पिक स्रोत मिलेगा और वे पेयजल पर अपनी निर्भरता कम कर सकेंगी। नगर निगम आयुक्त संस्कृति जैन के अनुसार, शहर में प्रतिदिन लगभग 360 एमएलड़ी सीवेज निकलता है। निगम के 18 सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट और 44 पंप हाउस के माध्यम से करीब 204 एमएलड़ी सीवेज का उपचार किया जाता है। इसका मतलब है कि रोजाना लगभग 20 करोड़ 40 लाख लीटर पानी को साफ किया जा रहा है। फिलहाल, इस उपचारित पानी का इस्तेमाल पार्कों, सेंट्रल वर्ज, सड़कों पर छिड़काव और प्रदूषण नियंत्रण के लिए फॉगिंग जैसे कामों में होता है। अब इसे औद्योगिक जरूरतों में इस्तेमाल करने की तैयारी है, ताकि उपचारित पानी की उपयोगिता को बढ़ाया जा सके।
भविष्य में गोविंदपुरा और मंडीदीप तक इस व्यवस्था का विस्तार होने से औद्योगिक इकाइयों में साफ पानी की मांग को घटाने में काफी मदद मिल सकती है, जिससे पेयजल संसाधनों पर दबाव कम होगा।
