बाल अधिकार संरक्षण की अध्यक्ष ने सौंपी रिपोर्ट, 42 बालकों को दो कमरों में ठूंसा गया था
मध्य प्रदेश में बाल अधिकार संरक्षण की अध्यक्ष डॉ निवेदिता शर्मा ने एजी ऑफिस के पास चल रहे मदरसा दारूल कुरआन की निरीक्षण रिपोर्ट प्रशासन व महिला बाल विकास विभाग को सौंप दी है। इस निरीक्षण में मदरसे के पास मदरसा बोर्ड की मान्यता संबंधी कोई भी दस्तावेज नहीं मिले। संस्थान के बाहर न तो कोई नाम पट्टिका लगी थी और न ही संचालन समिति की कोई वैध जानकारी उपलब्ध कराई गई थी। संयुक्त जांच दल जब मदरसे में पहुंचा तो प्रबंधन ने परिसर में बालिकाओं के होने की जानकारी पूरी तरह छिपा ली थी। सघन तलाशी के बाद संचालक परिवार के निजी आवास के अंदर 10 बाय 10 वर्गफीट के एक छोटे कमरे में 15 बालिकाएं बंद पाई गईं। इन बालिकाओं ने बताया कि मदरसे में रहने वाली बाजी उनसे घरेलू काम, कपड़े व जूठे बर्तन धोने और टॉयलेट की सफाई जैसे सभी काम करवाती थीं। काम में जरा सी चूक होने पर उनकी बेरहमी से पिटाई की जाती थी, और कभी-कभी तो बाउंसर बुलाकर भी पिटवाया जाता था। बालिकाओं को उनके मम्मी-पापा को भी सूचना नहीं दी जाती थी। मदरसे में लड़कों की स्थिति भी बेहद बदतर मिली। 42 पंजीकृत बालकों को मात्र दो कमरों में ठूंस दिया गया था, जिसका मतलब है कि प्रति कमरे में 21 बच्चे रहने को मजबूर थे। बालकों के शौचालयों में दरवाजे तक नहीं थे, जिससे उन्हें खुले में शौच जाना पड़ता था, जो मानवीय गरिमा और बाल सुरक्षा का खुला उल्लंघन है। बच्चों ने जांच दल को यह भी बताया कि रात के समय दो बाउंसर मदरसे में आते थे और उनके साथ मारपीट करते थे। बीमार पड़ने पर बच्चों को डॉक्टर से परामर्श नहीं दिया जाता था। तबीयत अत्यधिक बिगड़ने पर ही उन्हें अस्पताल ले जाया जाता था, लेकिन माता-पिता को इसकी सूचना नहीं दी जाती थी। मदरसे में मप्र के अलावा राजस्थान, महाराष्ट्र, असम और बिहार के बच्चे भी पाए गए। इनमें से कई बच्चों का दाखिला औपचारिक स्कूलों में दिखाया गया था, लेकिन पूछताछ में बच्चों ने स्वीकार किया कि वे कभी नियमित स्कूल नहीं गए। बच्चों ने खुलासा किया कि वे केवल वार्षिक या बोर्ड परीक्षा देने के लिए ही स्कूल जाते थे। स्कूल में उनकी नियमित उपस्थिति जावेद सर, मोहम्मद शाकिर और मो. साबिर द्वारा मिलीभगत कर दर्ज करवा दी जाती थी। वित्तीय अनियमितताएं भी सामने आईं। मदरसे में बालिकाओं से 800 रुपए और बालकों से 500 रुपए प्रति माह शुल्क वसूला जा रहा था, लेकिन इस राशि का कोई भी आधिकारिक लेखा-जोखा या रसीद उपलब्ध नहीं कराई गई। कर्मचारियों की सूची, स्कॉलर रजिस्टर, उपस्थिति पंजिका, स्टॉक रजिस्टर और कर्मचारियों का पुलिस वेरिफिकेशन जैसे अनिवार्य वैधानिक रिकॉर्ड मौके पर नदारद मिले।

