जेल प्रशासन ने कैदियों को उनके पूर्वजों के प्रति कर्तव्य निभाने, मानसिक शांति देने और उन्हें सकारात्मकता से जोड़ने के उद्देश्य से यह पहल की। इस आयोजन का सबसे मार्मिक पहलू यह था कि हत्या जैसे गंभीर अपराधों में सजा काट रहे कुछ बंदियों ने अपने पूर्वजों के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी तर्पण और पिंडदान किया, जिनकी हत्या उनके हाथों हुई थी। पंडितों ने सभी बंदियों को एक साथ बैठाकर पूजन और तर्पण की प्रक्रिया कराई। जेल अधीक्षक मनोज कुमार साहू ने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य बंदियों को धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों से जोड़ना है। यह उन्हें अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य निभाने, मानसिक शांति पाने और जीवन में सकारात्मकता लाने में मदद करता है।
उज्जैन की केंद्रीय भैरवगढ़ जेल में बुधवार को श्राद्ध पक्ष के अवसर पर एक अनूठा आयोजन हुआ, जहाँ 125 कैदियों ने न केवल अपने पूर्वजों के लिए तर्पण और पिंडदान किया, बल्कि उन लोगों के लिए भी यह कर्मकांड संपन्न किया जिनकी हत्या उन्होंने अनजाने में या जानबूझकर की थी। यह 11वां वार्षिक आयोजन था, जिसे जेल प्रशासन ने कैदियों को आध्यात्मिक गतिविधियों से जोड़कर आत्ममंथन और प्रायश्चित का अवसर देने के उद्देश्य से आयोजित किया। जेल अधीक्षक मनोज कुमार साहू ने बताया कि इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य बंदियों को अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य निभाने, मानसिक शांति प्रदान करने और उन्हें सकारात्मकता से जोड़ने का प्रयास करना है। जेल नियमों के चलते कैदी सिद्धवट और रामघाट जैसे प्रमुख घाटों पर जाकर पारंपरिक तर्पण नहीं कर सकते, इसलिए जेल परिसर में ही श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान की विशेष व्यवस्था की गई थी। इस 11वें वार्षिक आयोजन में 125 कैदियों ने विधि-विधान से अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों के लिए तर्पण किया। जेल अधीक्षक ने बताया कि यह आयोजन लगातार 11 साल से केंद्रीय भैरवगढ़ जेल में आयोजित किया जा रहा है, जिससे बंदियों को अपने कर्मों पर विचार करने और प्रायश्चित करने का मौका मिलता है। इस आयोजन का सबसे मार्मिक पहलू यह था कि हत्या जैसे गंभीर अपराधों में आजीवन कारावास की सजा काट रहे कुछ बंदियों ने अपने पूर्वजों के साथ-साथ उन लोगों के लिए भी तर्पण और पिंडदान किया, जिनकी मृत्यु उनके हाथों हुई थी। पंडितों ने सभी बंदियों को एक साथ बैठाकर पूजन और तर्पण की विधि बताई और प्रक्रिया संपन्न कराई। इस दौरान कैदियों ने दिवंगत आत्माओं की शांति के लिए प्रार्थना की और अपने द्वारा किए गए अपराधों के लिए क्षमा मांगी, जिससे जेल की चारदीवारी में एक आध्यात्मिक माहौल बना रहा। जेल अधीक्षक मनोज कुमार साहू ने इस आयोजन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि इसका उद्देश्य बंदियों को धार्मिक और आध्यात्मिक गतिविधियों से जोड़ना है। उन्होंने कहा, "यह आयोजन उन्हें अपने अपराधों पर आत्ममंथन करने और प्रायश्चित करने का एक अनूठा अवसर प्रदान करता है। " इसके माध्यम से कैदी अपने पूर्वजों के प्रति अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते हुए मानसिक शांति प्राप्त करने का प्रयास करते हैं और जीवन में सकारात्मकता लाने की कोशिश करते हैं। हत्या के मामले में सजा काट रहे बंदी नंदकिशोर धाकड़ ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया, "मैंने अपनी मृत माँ के लिए तो तर्पण किया ही, साथ ही उन पाँच लोगों के लिए भी तर्पण किया जिनकी हत्या मुझसे गलती से हुई थी। " उन्होंने कहा कि इस आयोजन ने उन्हें अपने किए पर पश्चाताप करने और शांति पाने में मदद की। जेल के भीतर वैदिक मंत्रोच्चार गूंजते रहे और दिनभर एक आध्यात्मिक वातावरण बना रहा, जो सामान्यतः कड़ी सुरक्षा में रहने वाली जेल के लिए एक अनूठा अनुभव था। यह आयोजन न केवल कैदियों को उनकी धार्मिक और सामाजिक जिम्मेदारियों का अहसास कराता है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की दिशा में भी एक महत्वपूर्ण कदम है। जेल प्रशासन का मानना है कि ऐसे आयोजन कैदियों के मन में सुधार और सकारात्मक बदलाव लाने में सहायक होते हैं। यह आयोजन कैदियों को अपने अतीत के कर्मों पर विचार करने और भविष्य में बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। जेल अधीक्षक मनोज कुमार साहू ने बताया कि इस आयोजन के पीछे का मुख्य विचार बंदियों के मन में अपराध बोध को कम करना और उन्हें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों का एहसास कराना है। उन्होंने यह भी जोड़ा कि यह आयोजन कैदियों को मानसिक रूप से स्थिर रखने में भी मदद करता है, जिससे वे जेल में अपने समय को अधिक सकारात्मक रूप से बिता सकें। यह कार्यक्रम हर साल श्राद्ध पक्ष में आयोजित किया जाता है, जो भारतीय संस्कृति में पूर्वजों को याद करने का समय है। इस वर्ष के सामूहिक तर्पण और पिंडदान में 125 कैदियों ने भाग लिया। यह आयोजन जेल परिसर के भीतर ही संपन्न हुआ, जहाँ पंडितों ने कैदियों को मंत्रोच्चार के साथ पूजन और तर्पण की विधि सिखाई। कैदियों ने अपने दिवंगत परिजनों और पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना की। यह आयोजन कैदियों के लिए एक भावनात्मक और आध्यात्मिक अनुभव रहा, जिसने उन्हें अपने किए पर पश्चाताप करने और शांति प्राप्त करने का अवसर दिया। केंद्रीय भैरवगढ़ जेल में यह 11वां वार्षिक आयोजन था, जो पिछले 11 सालों से लगातार आयोजित किया जा रहा है। जेल अधीक्षक ने बताया कि इस आयोजन की शुरुआत कैदियों को आध्यात्मिक और धार्मिक गतिविधियों से जोड़ने के उद्देश्य से की गई थी। इसका उद्देश्य उन्हें अपने अपराधों पर आत्ममंथन करने और प्रायश्चित करने का अवसर देना भी है। यह आयोजन कैदियों को अपने पूर्वजों के प्रति कर्तव्य निभाने और मानसिक शांति प्राप्त करने में मदद करता है। हत्या जैसे जघन्य अपराधों में सजा काट रहे बंदियों के लिए यह आयोजन विशेष रूप से मार्मिक था। उन्होंने न केवल अपने पूर्वजों के लिए तर्पण किया, बल्कि उन लोगों के लिए भी पिंडदान किया जिनकी मृत्यु उनके हाथों हुई थी। इस भावुक क्षण ने कैदियों को अपने कर्मों पर गहराई से विचार करने के लिए प्रेरित किया।

