भारत को चाहिए कि वह एआई में अपनी क्षमताओं को बढ़ाए
नई दिल्ली में, 23 सितंबर को आयोजित शिखर सम्मेलन में, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) पर सहयोग की संभावना का उल्लेख किया। यह बैठक एक ऐसे समय में हुई जब अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा अपने चरम पर है। शी ने इस क्षेत्र में एक खुला मंच स्थापित करने का प्रस्ताव रखा, जिससे दोनों देशों के बीच संवाद और सहयोग को बढ़ावा मिल सके। अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन और शी जिनपिंग के बीच यह वार्ता एआई सुरक्षा को लेकर चिंता का एक महत्वपूर्ण बिंदु बनी। अमेरिकी प्रशासन ने एआई के विकास पर मानव नियंत्रण बनाए रखने की आवश्यकता पर जोर दिया। बाइडन ने कहा कि एआई को हमेशा मानव नियंत्रण में रहना चाहिए। इस शिखर सम्मेलन में, एआई सुरक्षा पर चर्चा करने के लिए कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर विचार किया गया। इसमें एक ऐसा चैनल स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया, जो एआई से संबंधित घटनाओं की सूचना देने में मदद करेगा। यह कदम अमेरिका और चीन के बीच आपसी विश्वास को बढ़ाने का एक प्रयास है। इसी बीच, बीजिंग अपनी तकनीकी रणनीतियों को बढ़ावा देने के लिए ब्रिक्स जैसे अन्य मंचों का उपयोग कर रहा है। चीन ने एआई में अपनी शक्ति बढ़ाने के लिए विभिन्न देशों के साथ सहयोग को प्राथमिकता दी है। बीजिंग का मानना है कि वैश्विक स्तर पर तकनीकी प्रतिस्पर्धा में भागीदारी उनकी रणनीतिक स्थिति को मजबूत करेगी। चीन के सरकारी मीडिया ने एंथ्रोपिक पर आरोप लगाया है कि वह 'सुरक्षा' के नाम पर एआई नियमों को अपने पक्ष में मोड़ने का प्रयास कर रहा है। इसके तहत, वह चीन के ओपन-सोर्स मॉडलों को रोकने के लिए सुरक्षा खतरे का हवाला दे रहा है। यह स्थिति अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी विवादों को और बढ़ा सकती है। अमेरिका के वाशिंगटन में, 20 सितंबर को एआई वार्ता का पहला दौर आयोजित हुआ। इसमें अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट और चीनी उप प्रधानमंत्री हे लिफेंग ने मिलकर चर्चा की। यह बैठक दोनों देशों के व्यापार तंत्र के तहत हुई और यह प्रदर्शित करती है कि दोनों पक्ष एआई के क्षेत्र में सहयोग के लिए तैयार हैं। हालांकि, भारत अब भी शी जिनपिंग की विश्व आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सहयोग संगठन (डब्ल्यूएआईसीओ) में शामिल होने से हिचक रहा है। भारत की चिंता है कि यह चीन-केंद्रित एजेंडे को बढ़ावा देने का एक एकतरफा प्रयास हो सकता है। भारत का मानना है कि तकनीकी संप्रभुता की घोषणाओं से अधिक महत्वपूर्ण है, जो क्षमताएं वह अपने देश में विकसित करेगा। बाइडन और जिनपिंग की चर्चा में यह भी कहा गया कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित करने के लिए नियमों की आवश्यकता है। इस संबंध में, दोनों देशों ने एआई के विकास पर सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन इससे जुड़े जोखिमों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भारत के लिए, एआई में अपनी क्षमताओं के विकास पर ध्यान केंद्रित करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसके लिए, भारत को घरेलू स्तर पर कंप्यूटिंग, चिप्स, मॉडलों, डेटासेट्स और प्रतिभाओं का निर्माण करना होगा। यह कदम न केवल भारत की तकनीकी क्षमता को बढ़ाएगा, बल्कि वैश्विक स्तर पर उसकी स्थिति को भी मजबूत करेगा। शिखर सम्मेलन में, एआई के जोखिमों और फायदों पर संवाद को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया गया। यह संवाद भविष्य में होने वाली बैठकों में महत्वपूर्ण रहेगा। इसके तहत, दोनों पक्षों ने अगली बैठक नवंबर में आयोजित करने का आश्वासन दिया। अमेरिका और चीन के बीच एआई सुरक्षा को लेकर चिंताओं में वृद्धि हुई है। अमेरिकी प्रशासन ने एआई के विकास को लेकर नई नीतियों की रूपरेखा तैयार की है। इसमें एआई से संबंधित घटनाओं की सूचना देने के लिए एक विशेष चैनल स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया। भारत को चाहिए कि वह अमेरिका-चीन के बीच किसी भी कदम का स्वागत करे, जो जोखिम को कम करता है। साथ ही, उसे यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि एआई के क्षेत्र में नियम बहुपक्षीय हों। यह सुनिश्चित करने के लिए भारत को अमेरिका के साथ सहयोग बढ़ाने की आवश्यकता है। अमेरिका ने एआई सुरक्षा को लेकर कई महत्वपूर्ण पहलें की हैं। इनमें से एक पहल है कि एआई से जुड़ी घटनाओं को राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से देखा जाएगा। इससे यह सुनिश्चित होगा कि एआई तकनीक का विकास सही दिशा में हो। बीजिंग ने भी एआई सुरक्षा को लेकर अपनी चिंताओं का इज़हार किया है। चीन का कहना है कि एआई में जोखिमों को समझना और उनका समाधान खोजना अत्यंत आवश्यक है। इसके लिए, उन्होंने अपने सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने का निर्णय लिया है। भारत के लिए, यह महत्वपूर्ण है कि वह बीआरआईसीएस जैसे मंचों पर अधिक सक्रिय भूमिका निभाए। एआई से संबंधित पहलों को सहमति आधारित और प्रौद्योगिकी-तटस्थ बनाया जाना चाहिए। यह भारत को वैश्विक स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करने में मदद करेगा। शी जिनपिंग ने स्पष्ट किया है कि चीन एआई के विकास में आत्मनिर्भरता को प्राथमिकता देगा। इसके लिए, उन्होंने चिप्स के उत्पादन में आत्मनिर्भरता की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह कदम चीन को वैश्विक तकनीकी प्रतिस्पर्धा में मजबूती से खड़ा करेगा। एआई में प्रतिस्पर्धा को लेकर अमेरिका और चीन के दृष्टिकोण में स्पष्ट अंतर है। अमेरिका का मानना है कि एआई का विकास मानव नियंत्रण में रहना चाहिए, जबकि चीन इसे एक प्रतिस्पर्धा के रूप में देखता है। यह स्थिति वैश्विक स्तर पर तकनीकी विवादों को और बढ़ा सकती है। भारत को चाहिए कि वह अपने तकनीकी विकास को बढ़ावा देने के लिए ठोस कदम उठाए। इसके लिए, घरेलू स्तर पर संसाधनों का विकास और तकनीकी क्षमता का निर्माण करना आवश्यक है। यह भारत को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा में बनाए रखेगा। बीजिंग ने अपने ओपन-सोर्स मॉडलों को वैश्विक स्तर पर फैलाने की योजना बनाई है। यह कदम चीन की तकनीकी शक्ति को बढ़ाने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे चीन अन्य देशों में अपने मॉडलों को स्थापित करने में सफल हो सकता है।
