महंगी हवाई यात्रा पर दायर जनहित याचिका पर सुनवाई 16 नवंबर को, कोर्ट ने कहा 'मत करिए यात्रा'
महंगी हवाई यात्रा पर सुप्रीम कोर्ट का 'मत करिए यात्रा' जवाब, याचिकाकर्ता को सलाह
वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क्षेत्रीय संपर्क बढ़ाने के उद्देश्य से 'उड़ान' (उड़े देश का आम नागरिक) योजना की शुरुआत की थी। इस योजना का मूल मंत्र था कि हवाई चप्पल पहनने वाला आम आदमी भी हवाई जहाज में सफर कर सके। इस सपने को साकार करने के लिए एक घंटे की उड़ान का किराया 2500 रुपए से अधिक न होने का वादा किया गया था। यह जुमला, दो करोड़ रोजगार और हर खाते में 15 लाख रुपए जैसी अन्य घोषणाओं की तरह, लोगों के बीच काफी लोकप्रिय हुआ था। हालांकि, समय के साथ यह स्पष्ट हो गया कि गरीबों के हवाई यात्रा के सपने को पूरा करने की राह में कई बाधाएं थीं, और अब तो हालात यह हैं कि सामान्य नागरिक ट्रेनों में भी मुश्किल से सफर कर पा रहे हैं क्योंकि किराए में भारी वृद्धि हुई है। दूसरी ओर, जिनके पास महंगे जूते-चप्पल हैं, यानी कि वे लोग जो आर्थिक रूप से सक्षम हैं, उनके लिए भी हवाई यात्रा करना इस समय लगभग असंभव हो गया है। त्योहारों के मौसम में ट्रेनों में आरक्षित सीटें मिलना तो दूर, घरेलू हवाई टिकटों की कीमतें आसमान छू रही हैं। इस गंभीर समस्या को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में हवाई किराए में 700 प्रतिशत तक की वृद्धि का आरोप लगाते हुए अदालत से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की गई है। हालांकि, सोमवार, 2 नवंबर को जब याचिकाकर्ता के वकील ने इस मामले को जस्टिस विक्रमनाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस अपरेश कुमार सिंह की पीठ के समक्ष उठाया, तो न्यायाधीशों ने उन्हें हवाई यात्रा न करने की सलाह दी और कहा, 'मत करिए हवाई यात्रा। चलिए आगे बढ़िए, अगला केस। ' यह जवाब काफी हद तक परिचित लगता है, जैसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह कहना कि 'मैं प्याज नहीं खाती' जब प्याज की कीमतें आसमान छू रही थीं। संक्षेप में, आम जनता के लिए संदेश यही है कि यदि खाने-पीने की चीजें महंगी लगें तो उनका सेवन बंद कर दें। यदि सरकारी अस्पतालों में सुविधाएं उपलब्ध न हों तो निजी अस्पतालों का रुख करें, और वहां भी इलाज महंगा लगे तो बीमार बने रहें। यदि स्कूल महंगे लगें तो बच्चों को पढ़ाने की सोचना छोड़ दें। यदि हवाई टिकटें महंगी हैं, तो विमान के बजाय ट्रेन से यात्रा करें, और यदि उसमें भी असुविधा हो तो जहां हैं, वहीं रहें। भले ही त्योहार हो, या किसी दुख या खुशी के अवसर पर परिवार के पास जाना हो, अपनी इच्छाओं को दबाएं और यात्रा न करें। इसका सीधा मतलब यह है कि आपकी यात्रा, खान-पान, इलाज, शिक्षा, मनोरंजन, साफ हवा-पानी और अच्छी सड़कें जैसी बुनियादी सुविधाएं अब सरकार की जिम्मेदारी नहीं रह गई हैं। आप स्वयं सरकार की जिम्मेदारी नहीं हैं, बल्कि आपको अपनी व्यवस्था स्वयं करनी होगी। मोदी सरकार ने एक ऐसे लोकतंत्र का निर्माण किया है जिसमें 'लोक' (जनता) और 'तंत्र' (व्यवस्था) दोनों ही धीरे-धीरे अदृश्य होते जा रहे हैं। बेशक, महंगी विमान यात्रा पर दायर मूल जनहित याचिका पर 16 नवंबर को सुनवाई निर्धारित है। यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता एस। लक्ष्मीनारायण द्वारा दायर की गई है। लेकिन तब तक दिवाली, भाई दूज और छठ पूजा जैसे प्रमुख त्योहारों के दौरान होने वाली अधिकांश यात्राएं संपन्न हो चुकी होंगी। इसलिए, इसी मूल याचिका के हिस्से के रूप में, मौजूदा स्थिति को देखते हुए अदालत में यह तत्काल आवेदन लगाया गया था। मूल याचिका में विमानन क्षेत्र में अधिक पारदर्शिता लाने, यात्रियों के हितों की रक्षा करने और हवाई किराए में होने वाले अप्रत्याशित उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करने के लिए एक नियामक व्यवस्था स्थापित करने की मांग की गई है। हालांकि, वर्तमान आवेदन में अदालत से मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने और मौजूदा त्योहारों के मौसम में हवाई किराए पर एक अस्थायी सीमा निर्धारित करने का अनुरोध किया गया था। याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत में यह तर्क दिया कि हवाई यात्रा एक आवश्यक सेवा है और किराए में इतनी भारी वृद्धि संविधान के अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन है। अनुच्छेद 14 कानून के समक्ष समानता और कानून के समान संरक्षण की गारंटी देता है। आवेदन में 29 अक्टूबर की एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा गया कि दिल्ली से कोलकाता का टिकट, जिसकी सामान्य कीमत लगभग 10,000 से 11,000 रुपये होती है, 6 नवंबर की यात्रा के लिए 78,694 रुपये तक पहुंच गया। यह भी बताया गया कि बेंगलुरु से दिल्ली का किराया, जो आमतौर पर 15,901 रुपये होता था, दोपहर तक बढ़कर 40,506 रुपये जा पहुंचा। मुंबई से दिल्ली का किराया 11,531 रुपये से सीधे 60,577 रुपये हो गया, जबकि दिल्ली से मुंबई का किराया 5,223 रुपये से सीधे 26,793 रुपये तक पहुंच गया। इन आंकड़ों से पता चलता है कि त्योहारों के दौरान किराए में कितनी बेतहाशा वृद्धि हुई है। विमानन कंपनियां हवाई किराए में इस भारी वृद्धि के लिए एविएशन टर्बाइन फ्यूल (एटीएफ) यानी विमान ईंधन की बढ़ती कीमतों को जिम्मेदार ठहराती रही हैं। यह सच है कि महंगे ईंधन के कारण किराए में कुछ वृद्धि उचित हो सकती है, लेकिन सामान्य किराए की तुलना में सात गुना तक कीमत बढ़ाना किसी भी तरह से तर्कसंगत नहीं ठहराया जा सकता। आवेदन में रेलवे, आवश्यक दवाओं और बिजली जैसी अन्य आवश्यक सेवाओं का उदाहरण देते हुए कहा गया है कि इन क्षेत्रों में कीमतों पर नियामक नियंत्रण मौजूद है। इसके विपरीत, हवाई यात्रा के मामले में, विशेष रूप से त्योहारों के दौरान, किराए में होने वाली कई गुना वृद्धि पर कोई प्रभावी नियंत्रण नहीं है। याचिकाकर्ता ने इस बात पर जोर दिया कि हवाई परिवहन को एक आवश्यक सेवा माना जाता है। ऐसे में, सरकार इस सेवा की कीमतों को पूरी तरह से अनियंत्रित नहीं छोड़ सकती। यह सरकार का कर्तव्य है कि वह आम जनता के हितों की रक्षा करे, खासकर जब यात्राएं त्योहारों और पारिवारिक जरूरतों से जुड़ी हों। लेकिन अब जबकि इस मामले में अदालत से दो टूक जवाब मिल गया है, तो यह संभावना है कि सरकार भी यात्रियों की इस गंभीर परेशानी को अनदेखा करती रहेगी। यह रवैया आम आदमी को निराश करने वाला है, क्योंकि उनकी उम्मीदें अक्सर न्यायपालिका से जुड़ी होती हैं। हालांकि, केंद्र सरकार ने 1 नवंबर को भारतीय विमानन नियम, 2026 अधिसूचित किए हैं, जो 1 जनवरी 2027 से प्रभावी होंगे। इन नए नियमों में सरकार को असाधारण परिस्थितियों में जनहित को ध्यान में रखते हुए विमानन कंपनियों के किराए के संबंध में निर्देश जारी करने का अधिकार दिया गया है। नियम 192 के तहत, निर्धारित विमानन सेवाएं संचालित करने वाली कंपनियों को परिचालन लागत सहित विभिन्न कारकों के आधार पर किराया निर्धारित करना होगा और किराए से संबंधित जानकारी नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (डीजीसीए) को देनी होगी। यह एक सकारात्मक कदम है, लेकिन। यह चिंता का विषय है कि 2027 तक, यानी जब तक ये नए नियम पूरी तरह लागू नहीं हो जाते, तब तक विमानन कंपनियां मनमाना किराया वसूलती रहेंगी, ऐसे आसार हैं। इस दौरान आम यात्रियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ेगा। पिछले साल की शुरुआत में प्रयागराज कुंभ मेले के दौरान भी हवाई किराए में भारी वृद्धि देखी गई थी, जिससे तीर्थयात्रियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा था। यह घटना दर्शाती है कि त्योहारों और विशेष आयोजनों के दौरान हवाई किराए का अनियंत्रित होना एक पुरानी समस्या है। यह स्थिति देश के आम नागरिकों के लिए अत्यंत चिंताजनक है। 'सबका साथ, सबका विकास' के नारे के बीच, यदि आम आदमी की बुनियादी यात्रा की आवश्यकताएं भी पूरी नहीं हो पा रही हैं, तो यह आत्म-चिंतन का विषय है। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि आवश्यक सेवाओं के किराए आम आदमी की पहुंच में रहें। अदालत के 'हवाई यात्रा मत करिए' जैसे जवाब ने जनता की उम्मीदों को झटका दिया है। यह दर्शाता है कि न्यायिक व्यवस्था भी कभी-कभी आम आदमी की कठिनाइयों को समझने में विफल रहती है। यह केवल एक जनहित याचिका का मामला नहीं है, बल्कि यह लाखों लोगों की बुनियादी जरूरत और उनके संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है। सरकार और न्यायपालिका दोनों को मिलकर इस समस्या का समाधान खोजना होगा ताकि 'हवाई चप्पल पहनने वाला' ही नहीं, बल्कि हर आम आदमी सुलभ हवाई यात्रा का सपना देख सके।

