ट्विशा मौत केस: रिटायर्ड जज गिरिबाला की जमानत याचिका खारिज, हाईकोर्ट ने कहा - फॉरेंसिक रिपोर्ट और जांच का इंतजार
जबलपुर हाईकोर्ट ने रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह की जमानत याचिका खारिज कर दी है। भोपाल के ट्विशा शर्मा मौत मामले में बुधवार को हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने यह फैसला सुनाया। जस्टिस अजय कुमार निरंकारी की बेंच ने कहा कि मामले में फॉरेंसिक और डिजिटल रिपोर्ट का इंतजार है, साथ ही जांच भी जारी है। ऐसे में गिरिबाला को फिलहाल रिहा नहीं किया जा सकता। उन पर ट्विशा को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपी बेटे समर्थ का साथ देने का आरोप है। सीबीआई ने भी उनकी जमानत का विरोध किया था। गिरिबाला 2 जून से भोपाल सेंट्रल जेल में बंद हैं। 4 नवंबर तक उन्हें जेल में 155 दिन हो चुके हैं, जो करीब 5 महीने 2 दिन के बराबर है। ट्विशा शर्मा की 12 मई 2026 को भोपाल स्थित ससुराल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गई थी। वह घर में फंदे पर लटकी मिली थीं। पति समर्थ और सास गिरिबाला ने पुलिस को बताया था कि ट्विशा ने आत्महत्या की है। इसके बाद मामले की जांच शुरू हुई थी। आरोपी सास गिरिबाला सिंह और पति समर्थ सिंह फिलहाल जेल में बंद हैं। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि घटना से ठीक पहले परिजनों के साथ हुई व्हाट्सएप चैट, सीसीटीवी फुटेज और मौत के बाद की परिस्थितियों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आरोपियों की घटना के बाद के व्यवहार को भी ध्यान में रखना होगा। कोर्ट ने कहा कि केवल यह तर्क देना पर्याप्त नहीं है कि आवेदिका गिरिबाला की कोई आपराधिक मंशा नहीं थी। इस पर केस डायरी में दर्ज अन्य सबूतों और परिस्थितियों के साथ विचार करना जरूरी है। कोर्ट के मुताबिक, आरोप गंभीर हैं और जांच में कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आए हैं। ट्विशा की मौत से ठीक पहले की परिस्थितियों, जारी जांच और लंबित फॉरेंसिक रिपोर्ट, डिजिटल रिपोर्ट को देखते हुए फिलहाल गिरिबाला को जमानत नहीं दी जा सकती। करीब 64 वर्षीय रिटायर्ड जज गिरिबाला सिंह ने कोर्ट में दलील दी कि व्हाट्सएप चैट में लगाए गए आरोप उनके खिलाफ नहीं, बल्कि बेटे समर्थ के खिलाफ हैं। उन्होंने ट्विशा के खाते में 7.5 लाख रुपए ट्रांसफर किए थे, जो दहेज मांगने के आरोप के विपरीत है। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 80(2) के तहत मौत से ठीक पहले क्रूरता का कोई सबूत नहीं है। गिरिबाला अपना वॉयस सैंपल भी दे चुकी हैं, ऐसे में उन्हें हिरासत में रखने की जरूरत नहीं है। सीबीआई, राज्य सरकार और आपत्तिकर्ता ने गिरिबाला की जमानत का विरोध करते हुए व्हाट्सएप चैट, सीसीटीवी फुटेज, प्रभावशाली लोगों से कथित संपर्क और लंबित फॉरेंसिक रिपोर्ट का हवाला दिया। सीबीआई ने पिछली सुनवाई में कहा था कि गिरिबाला प्रभावशाली व्यक्ति हैं और पहले मामले की 'समानांतर जांच' कर चुकी हैं। यह मामला पहले भोपाल के कटारा हिल्स थाने में दर्ज हुआ था। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर बाद में जांच सीबीआई को सौंप दी गई थी। भोपाल की निचली अदालत ने 15 मई 2026 को गिरिबाला को अग्रिम जमानत दी थी।
