राजधानी भोपाल के सबसे सुरक्षित वीआईपी इलाकों में चंदन चोरों का एक संगठित अंतरराज्यीय गिरोह बेखौफ होकर वारदातें कर रहा है। डीजीपी कैलाश मकवाणा के बंगले की बाउंड्री से महज 20 फीट की दूरी पर स्थित प्रमुख सचिव विवेक पोरवाल के बंगले से लेकर सीसीएफ दफ्तर, विधानसभा परिसर, स्वर्ण जयंती पार्क और बरकतउल्ला विवि (बीयू) तक से चंदन के पेड़ काटे जा चुके हैं। पिछले 5 सालों में इस सिंडिकेट ने 'पुष्पा' फिल्म की तर्ज पर चंदन चोरी की 80 से ज्यादा वारदातों को अंजाम दिया है। 24 घंटे हथियारबंद जवानों की कड़ी निगरानी और सीसीटीवी कैमरों की मौजूदगी के बावजूद भोपाल पुलिस केवल तीन मामलों में ही सफलता हासिल कर पाई है। नए कानून भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 111 के तहत संगठित अपराध पर सख्त कार्रवाई और संपत्ति जब्ती का प्रावधान है। इसके बावजूद हबीबगंज, टीटी नगर, अरेरा हिल्स, कोहेफिजा और बागसेवनिया जैसे बड़े थानों की पुलिस इन वारदातों को साधारण चोरी की धाराओं में दर्ज कर रही है। कानून के जानकार मानते हैं कि ऐसा सिंडिकेट की विस्तृत जांच से बचने के उद्देश्य से किया जा रहा है। वर्ष 2020 में भोपाल क्राइम ब्रांच ने ऐसे ही एक गिरोह का खुलासा किया था, जिसमें जांच के दौरान सामने आया था कि वारदातों के पीछे चार अलग-अलग लेयर में बंटा एक सिंडिकेट काम करता है। इस बीच, भोपाल पुलिस कमिश्नर संजय कुमार का कहना है कि चंदन चोरी के सभी मामलों में पुलिस अपने स्तर पर गहन विवेचना कर रही है। चाहे वह अधिकारियों के घर हों या अन्य स्थान, हर बिंदु पर कड़ी नजर रखी जा रही है। पुलिस संगठित अपराध से जुड़े सभी पहलुओं पर भी काम कर रही है और कुछ अहम जानकारियां हाथ लगी हैं, जिनके आधार पर जल्द ही मामले का खुलासा किया जाएगा। गिरोह पुलिस की नजरों से बचने के लिए खास तरीके अपनाता है। वे अक्सर हरे रंग के कपड़े पहनते हैं ताकि रात में पेड़ों और झाड़ियों के बीच छिप सकें। इस गिरोह का काम करने का तरीका चार लेयर में बंटा हुआ है। लेयर 1 में रेकी करने वाले और ग्राउंड कटर का इस्तेमाल करने वाले सदस्य शामिल होते हैं। ये लोग दिन में खानाबदोशों की तरह घूमते हैं और अलग-अलग बहानों से वीआईपी कॉलोनियों में जाकर बाउंड्रीवॉल से बाहर लटकी टहनियों से 15-20 साल पुराने मोटे चंदन के पेड़ों की पहचान करते हैं। लेयर 2 में लोकल लॉजिस्टिक्स और कैमोफ्लेज का काम होता है। रात 2 से 4 बजे के बीच ये चोर गहरे हरे कपड़े पहनकर बंगलों में घुसते हैं। पेड़ काटने के बाद वे लकड़ियों को पास के पार्कों में ले जाकर टुकड़े करते हैं। फिर चेकिंग या पुलिस की नजर से बचने के लिए अक्सर नालों के रास्ते लकड़ियां लेकर निकल जाते हैं। लेयर 3 में इंटरमीडिएट डीलर होते हैं, जो सीहोर, देवास और उज्जैन जैसे जिलों से टहनियां और तने का किलोग्राम के हिसाब से भाव तय करके खरीद लेते हैं। लेयर 4 में किंगपिन और इत्र उद्योग से जुड़े लोग शामिल होते हैं। पकड़े गए गिरोह ने खुलासा किया था कि चोरी किया गया चंदन का माल कन्नौज की इत्र इंडस्ट्री और नागपुर की अवैध मंडियों में भेजा जाता है। वहां हार्ट वुड यानी तने को 10 हजार से 15 हजार रुपए प्रति किलोग्राम तक में बेचा जाता है। वीआईपी परिसरों में चंदन पेड़ों का जीपीएस ट्री-सेंसस न होना और कैमरों के ब्लाइंड स्पॉट का फायदा उठाया जाता है। चंदन के पेड़ की बाहरी सफेद लकड़ी (सैप वुड) में तेल नहीं होता, इसलिए तस्कर उसे मौके पर ही छीलकर फेंक देते हैं।
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वीआईपी इलाकों से चंदन चोरी: 80 से ज्यादा वारदातें, सिर्फ 3 खुलासे
3 नवंबर 2026 को 9:57 pm बजे

वीआईपी इलाकों से चंदन चोरी: 80 से ज्यादा वारदातें, सिर्फ 3 खुलासे
