चीन के साथ 64 साल बाद भी सीमा पर तनाव की कोशिशें जारी, भारत ने सुरक्षा और बुनियादी ढांचे को किया मजबूत
इतिहास के संयोग अक्सर त्रासदियां रचते हैं, और यही कड़वा सच एक बार फिर पूर्वोत्तर की हमारी सीमाओं पर मंडरा रहा है। यह बात अक्तूबर-नवंबर 1962 की सर्द रातों की है, जब लाल सेना के सैनिक हमारी सीमा में घुस आए थे। उस भीषण जंग में भारत को हताशा का सामना करना पड़ा था, और आज 64 बरस बीत जाने के बावजूद, उसी पूर्वोत्तर क्षेत्र में तथाकथित घुसपैठ को लेकर माहौल को गरमाने की कोशिशें जारी हैं। सरकार ने सीमाओं की सुरक्षा को लेकर अपनी स्थिति स्पष्ट कर दी है, लेकिन सोशल मीडिया पर अदृश्य सुपारी किलर और विपक्ष अपनी नाखुशी जाहिर करने से बाज नहीं आ रहे हैं। तब और अब में एकमात्र अंतर यह है कि 1962 में हंगामा खड़ा करने वाले आज सत्ता में काबिज हैं, और तब के हुक्मरानों के वारिस अब विपक्ष की कतारों को आबाद कर रहे हैं। समय के साथ देश और दुनिया बदल गई है, पर हमारे राजनीतिज्ञ इस अनुपात में क्यों नहीं बदले, यह एक बड़ा प्रश्न है। इन संघर्ष-कथाओं और राजनैतिक दांव-पेंचों से इतर एक और कड़वा सच है, जिसे दरकिनार करना असंभव है। हम दिवाली पर जिन झालरों से अपने घरों को सजाते हैं और जिन मूर्तियों की पूजा करते हैं, वे अक्सर हमारे पड़ोसी देश चीन से आयात की जाती हैं। चीन निर्मित वस्तुओं का भारतीयों के जीवन पर गहरा प्रभाव है, लेकिन दुर्भाग्यवश, चीनियों के जीवन पर हमारा असर अत्यंत सीमित है। हमें अपनी आर्थिक स्थिति को इतना मजबूत बनाना होगा कि चीन या कोई भी अन्य देश हमारी ओर आंख उठाने से पहले 50 बार सोचे। स्वदेशी के नारों के साथ हमने निश्चित रूप से प्रगति की है, पर अभी हमें एक लंबी दूरी तय करनी है। चीन हमारा सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी है, लेकिन उसके साथ हमारे व्यापार में हम 10-12वें नंबर के साझीदार हैं। इस बड़ी रिक्ति को पाटना अत्यंत आवश्यक है। हम भली-भांति जानते हैं कि चीन की सत्ता-व्यवस्था बंद दरवाजों की नीति में विश्वास करती है, इसीलिए वहां के आम लोग भारत और भारतीयों के बारे में बहुत कम जानकारी रखते हैं। जानकारी का यह अभाव वहां वैसा बवंडर नहीं खड़ा करता, जैसा हमारे देश में देखा जाता है। चीन के रमणीक तटीय शहर चिन्हुआंगदाओ में अपने नौजवान गाइड से बातचीत के दौरान जब मैंने पूछा कि आप भारत के बारे में क्या जानते हैं, तो उसका जवाब था, ‘बहुत कम, क्योंकि हम वही पढ़ते और देखते हैं, जो सरकार चाहती है। ’ चीन में भारत एवं चीन के बीच आर्थिक असंतुलन और वहां के लोगों की अनभिज्ञता के कारण दोनों देशों के बीच अमन की मांग वहां जोर नहीं पकड़ पाती। इस तथ्य को पाकिस्तान के संदर्भ में भी समझा जा सकता है। भारत और पाकिस्तान चार युद्ध लड़ चुके हैं, और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ हमारे बीच की ताजा झड़प थी। पाकिस्तान के इस जन्मजात वैमनस्य के बावजूद, दोनों देशों के आम लोग शांति के पक्ष में रहते हैं, क्योंकि हमारे और उनके बीच रोटी-बेटी के रिश्ते कायम हैं। दूसरी ओर, चीन हजारों साल से हमारा सांस्कृतिक सहयोगी रहा है, पर भौगोलिक दुरूहता ने कभी भी आपस में आम आदमी से आम आदमी के रिश्ते को जन्म नहीं लेने दिया। कुछ हद तक वहां की सत्ता संरचना और कुछ हद तक दोनों देशों के निवासियों की एक-दूसरे के प्रति अजनबीयत बीजिंग को बेलगाम करती है। यही कारण है कि दोनों देशों के बीच जारी सीमा संबंधी बातचीत के परवान न चढ़ने की एक वजह यह भी है। अब हम मौजूदा झड़पों पर आते हैं। भारत और चीन की रेखांकन रहित सीमा को ऐतिहासिक कारणों से वास्तविक सीमा रेखा कहा जाता है। किसी स्पष्ट चिह्नांकन के अभाव में, दोनों देशों के गश्ती दल कभी-कदा एक-दूसरे की सीमा में कुछ किलोमीटर तक चले जाते हैं। इनमें आपस में झड़पें भी हो जाती हैं, मगर गलवान को छोड़कर, दोनों पक्ष बड़े पैमाने पर खून-खराबे से बचते आए हैं। रही बात मौजूदा विवाद की, तो इसकी शुरुआत पिछले हफ्ते भारत-तिब्बत सीमा पुलिस बल के सेवानिवृत्त महानिदेशक शत्रुजीत कपूर के एक वीडियो से हुई। इस वीडियो में अपने सहयोगियों से बात करते हुए उन्हें यह कहते सुना गया कि भारत-चीन के बलों के बीच जुलाई में शुरू हुई झड़प आज तक जारी है। सोशल मीडिया के शहसवारों को कपूर के बयान से पंख मिल गए और तरह-तरह के वीडियो और पोस्ट वायरल होने लगे, जिनमें ऊटपटांग दावे किए जा रहे थे। उसी शाम विदेश मंत्रालय ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि यह अतिरंजना है। उधर, आईटीबीपी ने अपने महानिदेशक का यह वीडियो अपने हैंडल से हटा कर दिया। शत्रुजीत कपूर 31 अक्टूबर को इस विवाद शृंखला को पीछे छोड़ शासकीय सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके हैं। कुछ लोग शायद मेरी इस बात को अन्यथा लें, लेकिन इसमें कोई दो राय नहीं है कि भारत ने पिछले दस वर्षों में चीन सीमा पर अपनी स्थिति लगातार मजबूत की है। रोहतांग, जोजिला और सेला जैसे दुर्गम दर्रों में सुरंगों का निर्माण करके यह सुनिश्चित किया गया है कि चीन की ओर जाने वाली सीमाओं पर यातायात 12 महीने खुले रहें। जो लोग सीमावर्ती प्रदेशों में हो रहे परिवर्तनों से अवगत हैं, उन्हें मालूम है कि युद्धस्तर पर सड़क और रेलमार्ग निर्माण के कार्य जारी हैं। यही नहीं, सीमावर्ती क्षेत्रों में हवाई पट्टियों को भी बेहतर किया गया है, ताकि आपात स्थिति में सैनिकों और सैन्य सामग्री को वहां तेजी से पहुंचाया जा सके। इसके अलावा, घातक घुसपैठ को रोकने के लिए हेरॉन मार्क-2 ड्रोन की तैनाती के साथ ‘ऑल वेदर सेंसर’ लगाए गए हैं। रिसैट और एमिसैट जैसे उपग्रह सतत निगरानी के लिए अलग से तैनात किए गए हैं। सियाचिन और कारगिल की वजह से हमारे पास उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में लंबे समय तक लड़ने की दक्षता रखने वाले दस्ते मौजूद हैं। इन दस्तों ने गलवान के बाद कैलाश पर्वतमालाओं पर साजो-सामान सहित तिरंगा गाड़कर चीन को चमत्कृत कर दिया था। जहां तक हमारे सैनिकों के शौर्य और क्षमता का सवाल है, तो मैं आपको सितंबर-अक्तूबर 1967 के दो इतिहास रचने वाले उदाहरणों से रूबरू कराना चाहूंगा। 1962 की जीत से इठलाते चीनी कमांडरों ने फतवा जारी किया था कि भारतीय सैनिक नाथू ला और चोला दर्रों को खाली कर दें। इसके लिए वे लगातार घुसपैठ कर रहे थे और इस घुसपैठ को रोकने के लिए मेजर जनरल सगत सिंह ने कंटीले तार लगवाने का फैसला किया। 11 सितंबर, 1967 को जब भारतीय सैनिक इस काम को अंजाम दे रहे थे, तब चीनी सैनिकों ने उन पर अंधाधुंध फायरिंग कर दी। हमारे कई जवान शहीद हो गए। इसके जवाब में मेजर जनरल सगत सिंह ने आर्मी मुख्यालय के निर्देशों का इंतजार किए बिना अपनी तोपों के मुंह खोल दिए। इसके बाद पहली अक्तूबर को भारत के गोरखों ने चोला में तमाम चीनी सैनिकों को अपनी खूखरियों से काट डाला था। इन दोनों संघर्षों में चीन के लगभग 500 सैनिक हताहत हुए थे। 88 भारतीय जवान भी शहीद हुए, लेकिन चीन को उसी समय यह एहसास हो गया था कि भारत को हर बार डराया नहीं जा सकता। क्या आपको नहीं लगता कि तब से लेकर अब तक भारत लगातार मजबूत हुआ है? यहां एक और तथ्य गौरतलब है। मोदी सरकार ने सीमावर्ती गांवों को अब 'आखिरी' की जगह 'देश का पहला गांव' कहना शुरू कर दिया है। चीन ताकतवर जरूर है, पर हम भी इतने कमजोर नहीं कि अपने पहले गांव गंवा दें। यह एक प्रतीकात्मक बदलाव है जो यह दर्शाता है कि सरकार इन सीमावर्ती क्षेत्रों को कितनी अहमियत देती है। 1962 के युद्ध के बाद से, भारत ने अपनी रक्षा तैयारियों को लगातार मजबूत किया है।
