कर संग्रह में भारी इजाफा और जीएसटी का विस्तार, अर्थव्यवस्था के लिए सुधारों के अगले दौर की मजबूत नींव
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) प्रणाली की परिपक्वता ने भारत की अर्थव्यवस्था में सुधारों के अगले चरण के लिए एक मजबूत आधार तैयार किया है। यह सुदृढ़ता हालिया राजस्व आंकड़ों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है, जो भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि और कर संग्रह में उल्लेखनीय इजाफे का संकेत देते हैं। यह उस सुधार के लिए एक अत्यंत उत्साहवर्धक आधार है जिसका उद्देश्य उद्यमों और सार्वजनिक वित्त, दोनों को संबल प्रदान करना है। जीएसटी प्रणाली में सहभागिता अत्यंत व्यापक रही है। इन चार महीनों का कुल संग्रह मिलकर लगभग 15 प्रतिशत की गति से बढ़ा। अगस्त के अंत तक केंद्र और राज्य क्षेत्राधिकारों के अंतर्गत कुल जीएसटी पंजीकरण लगभग 1.71 करोड़ तक पहुंच गए, जो एक वर्ष पहले की तुलना में लगभग 15 प्रतिशत अधिक हैं। कर दरों की हल्की संरचना के साथ-साथ दर्ज आर्थिक गतिविधियों में भी व्यापक विस्तार देखा गया है। सभी 11 क्षेत्रक समूहों और सभी प्रमुख राज्यों में दर्ज कर-योग्य आपूर्ति में वृद्धि देखी गई। यह विस्तार का दायरा उसके पैमाने जितना ही महत्वपूर्ण है। सुधार-उपरांत आंकड़े दर्शाते हैं कि इनपुट टैक्स क्रेडिट (आईटीसी) के माध्यम से चुकाई गई कर देयता का अनुपात बढ़ा है, जबकि कर-योग्य आपूर्ति के सापेक्ष संचित क्रेडिट में कमी आई है। यह उन व्यवसायों के लिए उत्साहवर्धक है जो पात्र क्रेडिट के प्रभावी उपयोग पर निर्भर करते हैं। इनपुट टैक्स क्रेडिट की कार्यप्रणाली इस अनुभव का एक अन्य महत्वपूर्ण हिस्सा है। कर वापसी (रिफंड) भी उतनी ही प्रासंगिक है। रिफंड के बाद शुद्ध संग्रह में भी इस छमाही के दौरान 10.4 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इस प्रकार करदाताओं को दी गई राहत और विकास के लिए उपलब्ध संसाधनों में वृद्धि साथ-साथ हुई है। जब कर राहत का प्रभाव कीमतों में दिखाई देता है, तो परिवारों के पास अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने या बचत करने के लिए अधिक गुंजाइश होती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप, 'नेक्स्ट-जेनरेशन जीएसटी' की परिकल्पना दो परस्पर जुड़े उद्देश्यों के साथ की गई थी: कर दरों को कम एवं तर्कसंगत बनाना और अनुपालन को अधिक सरल बनाना। 'नेक्स्ट-जेनरेशन जीएसटी' का लक्ष्य कर दरें कम करना, अनुपालन सरल बनाना। यह नौ वर्षों के क्रियान्वयन तथा करदाताओं और राज्यों के अनुभवों के आधार पर इसी प्रयास को आगे बढ़ाता है। इस व्यवस्था में राज्य इस पूरी यात्रा में बराबर के साझेदार रहे हैं। वे परिषद में अपनी प्राथमिकताओं और अनुभवों को लेकर आए, निर्णयों को आकार देने में सहयोग किया और उनके क्रियान्वयन का दायित्व संभाला। राज्यों की राजस्व स्थिति भी अधिक सुदृढ़ हुई है। भारत जैसी विविध अर्थव्यवस्था में यह व्यापक प्रसार अत्यंत महत्वपूर्ण है। विभिन्न क्षेत्रों और भौगोलिक हिस्सों में होने वाली यह वृद्धि अधिक से अधिक व्यवसायों को विस्तार लेते बाजारों में भाग लेने का अवसर देती है। इसके परिणामस्वरूप उत्पन्न मांग, निवेश तथा रोजगार से अधिकाधिक समुदायों को लाभान्वित करती है।

