महाकालेश्वर मंदिर में 4 बजे भस्म आरती में होगा विशेष पूजन
भस्म आरती में पुजारी परिवार की महिलाएं भगवान महाकाल को सुगंधित उबटन लगाकर विशेष पूजन करेंगी
इस बार रूप चौदस का पर्व 7 और 8 नवंबर को दो दिन मनाया जाएगा। तिथियों के घटने-बढ़ने के कारण यह निर्णय लिया गया है। उज्जैन के प्रसिद्ध महाकाल मंदिर में, रूप चौदस और दिवाली का उत्सव एक ही दिन, 8 नवंबर को मनाया जाएगा। रविवार की तड़के 4 बजे होने वाली भस्म आरती के दौरान, मंदिर के पुजारी परिवार की महिलाएं भगवान महाकाल को विशेष सुगंधित उबटन लगाकर उनका पूजन करेंगी। इसके बाद, मंदिर के गर्भगृह में पुजारी परिवार के सदस्य फुलझड़ियां जलाकर दिवाली का पर्व मनाएंगे। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और भक्तों के लिए विशेष महत्व रखती है। महाकालेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी महेश शर्मा ने विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि भस्म आरती के दौरान भगवान महाकाल को पंचामृत से स्नान कराया जाएगा। इसके पश्चात्, केसर, चंदन, इत्र, खस और सफेद तिल जैसी सुगंधित सामग्रियों से तैयार किए गए विशेष उबटन से भगवान का लेप किया जाएगा। यह उबटन भगवान के दिव्य रूप को निखारने और उन्हें विशेष श्रृंगार प्रदान करने के उद्देश्य से लगाया जाता है। उबटन के उपरांत, भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाएगा, जो विभिन्न प्रकार के अनाजों और सब्जियों से तैयार किया जाता है। इस विशेष पूजन के बाद, कपूर आरती का आयोजन किया जाएगा, जिसका नेतृत्व मंदिर की पुजारी परिवार की महिलाएं करेंगी। यह आरती साल में केवल एक बार ही होती है। पुजारी और पुरोहित परिवार की महिलाएं वर्ष में केवल एक बार, रूप चौदस के पावन अवसर पर, भस्म आरती में शामिल होकर भगवान महाकाल को उबटन लगाने का सौभाग्य प्राप्त करती हैं। वे स्वयं सुगंधित द्रव्यों का मिश्रण तैयार करती हैं और भगवान का विशेष श्रृंगार करती हैं। इस प्रक्रिया में, भगवान को पंचामृत अर्पित करने के बाद उन्हें उबटन लगाया जाता है और फिर विशेष कपूर आरती की जाती है। यह रस्म न केवल भगवान के प्रति उनकी श्रद्धा और भक्ति को दर्शाती है, बल्कि मंदिर की प्राचीन परंपराओं का भी निर्वहन करती है। यह आयोजन भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि वे इस अवसर पर भगवान का अनूठा रूप देख पाते हैं। रूप चौदस से लेकर महाशिवरात्रि तक, भगवान महाकाल को गर्म जल से स्नान कराने की परंपरा शुरू हो जाती है। मंदिर के पुजारी महेश गुरु के अनुसार, कार्तिक मास की चौदस से आधिकारिक तौर पर सर्दियों की शुरुआत मानी जाती है। इस मौसम परिवर्तन के कारण, भगवान महाकाल को ठंड से बचाने के उद्देश्य से उन्हें गर्म जल से स्नान कराने की प्रथा आरंभ की जाती है। प्रतिदिन होने वाली भस्म आरती के दौरान, भगवान महाकाल को गर्म जल से स्नान कराया जाएगा। यह पवित्र परंपरा महाशिवरात्रि के पावन पर्व तक जारी रहेगी, जो भक्तों को भगवान के प्रति सेवा और समर्पण का एक अनूठा अवसर प्रदान करती है। यह जल तात्विक रूप से शुद्ध और पवित्र माना जाता है। इस वर्ष, रूप चौदस का पर्व दो दिनों तक मनाया जाएगा, जो 7 और 8 नवंबर की तिथियों में पड़ रहा है। यह विशेष स्थिति पंचांग की गणनाओं के अनुसार तिथियों के घटने या बढ़ने के कारण उत्पन्न हुई है। हालांकि, उज्जैन स्थित महाकाल मंदिर में, रूप चौदस और दिवाली का उत्सव एक ही दिन, 8 नवंबर को आयोजित किया जाएगा। रविवार के दिन तड़के 4 बजे होने वाली भस्म आरती के समय, पुजारी परिवार की महिलाएं भगवान महाकाल को सुगंधित उबटन लगाकर उनका विशेष पूजन करेंगी। इसके पश्चात्, मंदिर के गर्भगृह में पुजारी परिवार के सदस्य फुलझड़ियां जलाकर दिवाली का पर्व मनाएंगे। यह आयोजन भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र रहेगा। महाकालेश्वर मंदिर के मुख्य पुजारी, महेश शर्मा, ने इस अनुष्ठान की विस्तृत जानकारी प्रदान की। उन्होंने बताया कि भस्म आरती के दौरान, भगवान महाकाल को सर्वप्रथम पंचामृत से स्नान कराया जाएगा। इसके बाद, केसर, चंदन, इत्र, खस और सफेद तिल जैसी पवित्र और सुगंधित सामग्रियों को मिलाकर तैयार किया गया विशेष उबटन भगवान को लगाया जाएगा। यह उबटन भगवान के दिव्य स्वरूप को और अधिक निखारने और उन्हें एक अलौकिक श्रृंगार प्रदान करने के लिए होता है। उबटन के पश्चात, भगवान को अन्नकूट का भोग लगाया जाएगा, जो विभिन्न प्रकार के अनाजों और सब्जियों का एक पवित्र मिश्रण होता है। इस विशेष पूजन के समापन पर, कपूर आरती का आयोजन होगा, जिसे मंदिर की पुजारी परिवार की महिलाएं संपन्न करेंगी।
