उज्जैन जिले में नीलगायों को पकड़कर दूसरी जगह भेजने के अभियान के पहले ही प्रयास में वन विभाग को अपेक्षित सफलता नहीं मिल सकी। ब्रजराजखेड़ी में दक्षिण अफ्रीकी बोमा तकनीक का इस्तेमाल करते हुए नीलगायों के झुंडों को घेरकर फनल तक पहुंचाया गया, लेकिन ज्यादातर जानवर अंदर जाने के बजाय वापस खुले में लौट गए। इस कारण पहले दिन केवल दो नीलगायों को पकड़ा जा सका, जिन्हें स्वास्थ्य जांच के बाद गांधीसागर अभयारण्य में छोड़ दिया गया। शाजापुर जिले में कृष्णमृग और नीलगायों के रेस्क्यू व स्थानांतरण अभियान की सफलता के बाद उज्जैन जिले में भी 31 अक्टूबर से यह अभियान शुरू किया गया था। बुधवार को ग्राम ब्रजराजखेड़ी में पहला ऑपरेशन हुआ। वन विभाग और दक्षिण अफ्रीकी विशेषज्ञ संस्था कंजर्वेशन सॉल्यूशन्स की टीम ने हेलीकॉप्टर की मदद से नीलगायों के झुंडों को बोमा संरचना की ओर धकेला। झुंडों में करीब 13 से 20 नीलगायें थीं, पर वे फनल के मुहाने तक आकर भी अंदर नहीं गईं। विशेषज्ञों के शुरुआती आकलन के अनुसार, बोमा संरचना देखकर नीलगायों के सतर्क होने और वापस लौटने की एक वजह उस क्षेत्र से उनकी पूर्व-परिचितता हो सकती है। स्थानीय ग्रामीणों और मैदानी अमले ने अभियान स्थल के आसपास कुछ झुंडों को पिछली शाम या रात में देखा था। ऐसे में यह संभावना है कि उन्होंने पहले ही बोमा संरचना को देख लिया हो। सुबह हेलीकॉप्टर से उसी दिशा में लाए जाने पर वे सतर्क हो गईं और संरचना में प्रवेश करने के बजाय लौट गईं। वन्यजीवों की स्थान से जुड़ी स्मृति और पुराने अनुभव उनके व्यवहार को प्रभावित कर सकते हैं। यही कारण है कि इस बार भी कई झुंड फनल के मुहाने तक पहुंचने के बाद वापस लौट गए। वन विभाग और विशेषज्ञ टीम पूरे ऑपरेशन का गहराई से आकलन कर रही है। इसका उद्देश्य अगले रेस्क्यू ऑपरेशन में इन परिस्थितियों को ध्यान में रखना और बेहतर रणनीति बनाना है। पिछले साल भी इसी स्थान पर बोमा संरचना स्थापित की गई थी, लेकिन तब भी अपेक्षित परिणाम नहीं मिले थे। उस अनुभव को देखते हुए भी इस बार टीम को सफलता की उम्मीद थी, जो पूरी नहीं हो सकी। यह तकनीक दक्षिण अफ्रीका में सफल साबित हुई है, लेकिन भारतीय वन्यजीवों के व्यवहार को समझना अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। अभियान के तहत हसामपुरा, पंथपिपलई, ताजपुर और केसुनी जैसे क्षेत्रों का हवाई सर्वेक्षण भी किया गया। केसुनी में लगभग 10 नीलगायों की मौजूदगी और वहां अनुकूल प्राकृतिक वनस्पति पाए जाने के बाद, अगला रेस्क्यू ऑपरेशन वहीं प्रस्तावित किया गया है। वन विभाग का मानना है कि केसुनी का इलाका नीलगायों के लिए अधिक उपयुक्त हो सकता है। यहां की भौगोलिक स्थिति और वनस्पति उन्हें आकर्षित कर सकती है, जिससे रेस्क्यू की सफलता की संभावना बढ़ सकती है। हेलीकॉप्टर का उपयोग नीलगायों के झुंडों को नियंत्रित करने और उन्हें बोमा संरचना की ओर निर्देशित करने के लिए किया गया। यह तकनीक दूर से झुंडों को निर्देशित करने में मदद करती है। हालांकि, नीलगायों के व्यवहार और उनकी सतर्कता के कारण यह पूरी तरह सफल नहीं हो पाई। विशेषज्ञ टीम इस बात का अध्ययन कर रही है कि क्या हेलीकॉप्टर के उपयोग के तरीके में कोई बदलाव की आवश्यकता है या नीलगायों को बोमा तक लाने के लिए किसी अन्य विधि का प्रयोग किया जाना चाहिए। दक्षिण अफ्रीकी बोमा तकनीक में, जानवरों को एक बड़े क्षेत्र में घेर लिया जाता है और फिर धीरे-धीरे एक संकीर्ण गलियारे के माध्यम से एक मजबूत बाड़े (बोमा) में धकेला जाता है। यह तकनीक आमतौर पर बड़े स्तनधारियों को पकड़ने के लिए प्रभावी होती है। इस मामले में, नीलगायों को फनल तक तो लाया गया, लेकिन वे अंतिम चरण में प्रवेश करने से हिचकिचा गईं। यह व्यवहार उनकी बुद्धिमत्ता और सतर्कता को दर्शाता है। पकड़ी गई दो नीलगायों का स्वास्थ्य परीक्षण किया गया। परीक्षणों में वे स्वस्थ पाई गईं। इसके बाद उन्हें सुरक्षित रूप से गांधीसागर अभयारण्य में छोड़ दिया गया। यह सुनिश्चित करने के लिए किया गया था कि वे नए वातावरण में आसानी से समायोजित हो सकें। अभयारण्य का चयन इस प्रकार किया गया था कि वहां उनके लिए पर्याप्त भोजन और सुरक्षित आश्रय उपलब्ध हो।
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उज्जैन में नीलगाय रेस्क्यू अभियान शुरू, पहले दिन दो ही जानवर फंसे
2 नवंबर 2026 को 10:51 pm बजे

उज्जैन में नीलगाय रेस्क्यू अभियान शुरू, पहले दिन दो ही जानवर फंसे
