मोबाइल गेम की लत के कारण रायपुर एम्स में 100 में से 12 बच्चे उपचारधीन हैं
छत्तीसगढ़ के रायपुर एम्स से जुड़ी एक चिंतित करने वाली खबर सामने आई है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि वहां इलाज के लिए आने वाले 100 में से 12 बच्चे मनोरोग के शिकार हैं, जो मोबाइल गेम की लत लगने के बाद उपचारधीन हैं। यह स्थिति दर्शाती है कि डिजिटल लत का बचपन पर मंडरा रहा खतरा बढ़ता जा रहा है। आज का बच्चा खेल मैदान से ज्यादा मोबाइल की स्क्रीन पर आंखें गड़ाए दिखाई देता है। इसके परिणामस्वरूप, पढ़ाई में मेहनत, सफलता के लिए इंतजार और विफलता को स्वीकार करना मुश्किल लगने लगता है। बच्चों के व्यवहार में गंभीर बदलाव दिखाई दें तो उसे केवल 'जिद' मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। दुनिया के कई देश बच्चों के स्क्रीन टाइम, सोशल मीडिया और ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर नियम कड़े कर रहे हैं। माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के साथ अधिक समय बिताएं। उनसे बातचीत करनी होगी, उनके साथ खेलना होगा और उनकी दुनिया को समझना होगा। हालांकि, मोबाइल हटाने या गेम बंद करने को लेकर माता-पिता और बच्चों के बीच बहस आम होती जा रही है। मोबाइल बंद करने का आदेश देने से ज्यादा प्रभावी है कि घर में संवाद और सहभागिता का माहौल बनाया जाए। कई बार संवाद की जगह विवाद ले लेता है। मोबाइल और ऑनलाइन गेम बच्चों के मनोरंजन तक ही सीमित नहीं रहे, बल्कि उनके व्यवहार, पढ़ाई और पारिवारिक संबंधों को भी प्रभावित करने लगे हैं। जरूरत हो तब ही मोबाइल बच्चे के हाथ में रहे, लेकिन बचपन मोबाइल के हाथ में नहीं जाना चाहिए। अत्यधिक स्क्रीन टाइम से नींद की कमी, सामाजिक अलगाव और लगातार डिजिटल उत्तेजना जैसी समस्याएं भी बढ़ सकती हैं। बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की स्पष्ट सीमा तय हो, सोने से पहले मोबाइल से दूरी हो और रचनात्मक गतिविधियों के लिए पर्याप्त समय निकाला जाए। मनचाही चीज न मिलने पर चिड़चिड़ापन, जिद और गुस्सा बढ़ सकता है। ऑनलाइन गेम की सबसे बड़ी खासियत तुरंत परिणाम होती है। कुछ ही सेकंड में जीत, हार, इनाम, अगला लेवल और लगातार मिलने वाला रोमांच बच्चे के दिमाग को तत्काल संतुष्टि का आदी बना सकता है। प्रौद्योगिकी आज की जरूरत है, लेकिन सुरक्षित बचपन उससे कहीं ज्यादा जरूरी है। यह इस बात का संकेत है कि माता-पिता और समाज को मिलकर इस समस्या का समाधान खोजना होगा। समस्या तब पैदा होती है, जब यही आदत वास्तविक जीवन में भी तुरंत परिणाम की अपेक्षा पैदा करने लगती है। जरूरत तकनीक से दूरी बनाने की नहीं, उसके इस्तेमाल में संतुलन पैदा करने की है। माता-पिता को बच्चों के साथ संवाद स्थापित करने की आवश्यकता है। बच्चों के साथ खेलकर, उनकी पसंद-नापसंद को समझकर, उन्हें सुरक्षित और स्वस्थ वातावरण में बढ़ने का अवसर देना चाहिए। इससे बच्चों में आत्मविश्वास बढ़ेगा और वे बेहतर तरीके से अपनी समस्याओं का सामना कर सकेंगे। स्क्रीन टाइम की सीमाएं तय करने के लिए माता-पिता को खुद भी अनुशासित होना होगा। बच्चों को यह सिखाना होगा कि तकनीक का इस्तेमाल कब और कैसे करना है। उन्हें पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद और अन्य रचनात्मक गतिविधियों के लिए भी प्रेरित करना होगा। बच्चों के लिए एक स्वस्थ और संतुलित जीवनशैली का निर्माण करना आवश्यक है। उनके लिए ऐसे कार्यक्रम और गतिविधियाँ आयोजित की जानी चाहिए, जो उनके मानसिक और शारीरिक विकास में सहायता करें। इससे वे मोबाइल की आदतों से दूर रहेंगे। अत्यधिक डिजिटल उत्तेजना से बच्चों का मानसिक विकास प्रभावित हो सकता है। इसलिए, माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चों के लिए ऐसे उपाय खोजें, जो उन्हें डिजिटल दुनिया से दूर रख सकें। उन्हें रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना और खेलकूद के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। बच्चों को यह सिखाना होगा कि असली दुनिया में भी संघर्ष और इंतजार की आवश्यकता होती है। तुरंत परिणाम की चाहत उन्हें असंतोष की ओर ले जा सकती है। इसीलिए, माता-पिता को उन्हें धैर्य और मेहनत का महत्व समझाना होगा। समाज में भी इस दिशा में जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। स्कूलों और समुदायों को मिलकर बच्चों के डिजिटल व्यवहार पर ध्यान देना चाहिए। इसके लिए कार्यशालाएँ और सेमिनार आयोजित किए जा सकते हैं। इस समस्या के समाधान के लिए सभी को मिलकर कार्य करना होगा।


