महक को इफरा का लिवर मिला, जिससे दोनों परिवारों के बीच गहरा बंधन बना
शुजालपुर में एक अद्भुत कहानी सामने आई है, जिसमें भारत और पाकिस्तान के बीच एक अनोखा रिश्ता कायम हुआ है। शुजालपुर की महक को पाकिस्तान की प्रोफेसर इफरा का लिवर मिला, जिसने महक को जीवनदान दिया। इस लिवर ट्रांसप्लांट के परिणामस्वरूप दोनों परिवारों के बीच एक विशेष बंधन विकसित हुआ। महक की उम्र अब 20 वर्ष है और वह एक सामान्य जीवन जी रही है। इफरा ने महक को अपना लिवर डोनेट किया था जब महक केवल 6 साल की थी। उस समय महक को जेनेटिक बीमारी के कारण लिवर ट्रांसप्लांट की सख्त जरूरत थी। इफरा का लिवर महक के शरीर में सफलतापूर्वक लगाया गया, जिससे उसकी जान बच गई। राकेश बाहेती, महक के पिता, कहते हैं, "इफरा मेरे लिए बहन हैं। " इस रिश्ते में न तो खून का रिश्ता है और न ही कोई पहले से पहचान थी, फिर भी संवाद और संबंध की गर्माहट सगे भाई-बहन की तरह है। दोनों परिवार एक-दूसरे के सुख-दुख साझा करते हैं और परिवार की बातें करते हैं। दोनों परिवारों के बीच कभी कोई त्योहार मनाने का अवसर नहीं आया, फिर भी रक्षाबंधन पर राकेश ने वीडियो कॉल के जरिए इफरा से पर्व की बधाई ली। इस दौरान उन्होंने कहा, "सरहदें रिश्ते नहीं बांट सकती। " इस बंधन ने न केवल महक की जिंदगी को बदल दिया, बल्कि रिश्तों की नई परिभाषा दी। महक की दादी राधा बाहेती ने भी अंगदान की भावना को आगे बढ़ाते हुए अपनी उम्र 75 वर्ष में अपना लिवर दान करने का निर्णय लिया था। यह निर्णय महक की जिंदगी बचाने के लिए लिया गया था। इस प्रकार, यह रिश्ता सिर्फ एक चिकित्सा प्रक्रिया का परिणाम नहीं था, बल्कि एक परिवार की एकजुटता का प्रतीक बन गया। इफरा की बड़ी बेटी ईशा वर्तमान में पाकिस्तान के पंजाब सूबे में कमिश्नर हैं और उन्होंने सीएसएस की परीक्षा पास की है। इस प्रकार, दोनों परिवारों के बीच संबंध केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और पेशेवर स्तर पर भी मजबूत हो रहे हैं। राकेश और इफरा एक-दूसरे की उपलब्धियों पर गर्व महसूस करते हैं। महक की जिंदगी में आने वाले बदलावों ने उसे और उसके परिवार को एक नई दिशा दी है। राकेश ने कहा, "हमारी मुलाकात जिस परिस्थिति में हुई, वह जिंदगी का सबसे अलग अनुभव था। " दोनों परिवार अब एक-दूसरे के लिए बहुत महत्वपूर्ण बन गए हैं।

