साक्षरता दर बढ़ने और समाज के बदलते स्वरूप से शिक्षक-स्नातक कोटे की प्रासंगिकता खत्म
संविधान में शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों का गठन एक नेक इरादे से किया गया था, जिसका उद्देश्य सदन में अनुभवी और जानकार लोगों को शामिल करना था। यह व्यवस्था समाज के प्रबुद्ध वर्ग से ऐसे प्रतिनिधियों को लाने के लिए थी जो राज्य की समस्याओं को गहराई से समझ सकें और उन्हें सदन में प्रभावी ढंग से रख सकें। राज्यसभा में विशेषज्ञों के मनोनयन का प्रावधान इसी सोच का विस्तार था, जिसके तहत 12 सदस्यों को नामित किया जा सकता था। इसी तरह, राज्यों में शिक्षकों और स्नातकों को विशेष वर्ग के रूप में चुना गया ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों की विशिष्ट समस्याओं को पहचान कर उनका समाधान प्रस्तुत कर सकें। यह अपेक्षा थी कि ये प्रतिनिधि समाज के बौद्धिक वर्ग का प्रतिनिधित्व करेंगे और जनहित में महत्वपूर्ण योगदान देंगे। हालांकि, समय के साथ इन निर्वाचन क्षेत्रों का मूल उद्देश्य धूमिल पड़ गया है और अब यह पूरी तरह से राजनीतिकरण का शिकार हो चुका है। वर्तमान परिदृश्य में, चुनावी प्रबंधन और धनबल हावी हो गए हैं, जिसके कारण ऐसे उम्मीदवार सदन में पहुँच रहे हैं जो केवल अपने राजनीतिक करियर को मजबूत बनाने में लगे हैं। वे जन समस्याओं और क्षेत्र विशेष के मुद्दों को समझने व हल करने के बजाय, चुनाव प्रबंधन में अपनी कुशलता और खर्च करने की क्षमता पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं। इस कारण, संविधान का वह मूल मकसद, जिसके लिए इन क्षेत्रों का निर्माण किया गया था, अब पूरा नहीं हो पा रहा है। जागरूकता की कमी भी इन चुनावों में मतदाताओं की भागीदारी को काफी कम करती है। जब संविधान में यह व्यवस्था की गई थी, तब देश में साक्षरता दर बहुत कम थी और स्नातक या शिक्षक समाज के अत्यंत प्रबुद्ध वर्ग माने जाते थे। गांवों में ऐसे लोग विरले ही होते थे, और शिक्षकों का सम्मान भी बहुत अधिक था। उस समय उनकी विशेषज्ञता को महत्व दिया जाता था। लेकिन आज स्थिति बहुत बदल गई है। देश की साक्षरता दर में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है और स्नातक की डिग्री अब कोई विशिष्ट योग्यता नहीं रह गई है। यदि शिक्षकों को प्रबुद्ध वर्ग माना जाए, तो वकील, डॉक्टर, इंजीनियर जैसे अन्य पेशेवर भी इसी श्रेणी में आते हैं, जिनके पास अपने-अपने क्षेत्रों की गहन जानकारी होती है। इसलिए, वर्तमान व्यवस्था का कोई विशेष औचित्य नहीं रह गया है। इस संदर्भ में, यह व्यवस्था समाप्त कर दी जानी चाहिए और राज्यसभा की तर्ज पर विशेषज्ञता के आधार पर सदस्यों का मनोनयन किया जाना चाहिए। इस प्रक्रिया के माध्यम से, विभिन्न क्षेत्रों के योग्य व्यक्तियों, चाहे वे शिक्षक, वकील, डॉक्टर, वैज्ञानिक या उद्यमी हों, को सदन में लाया जा सकता है। ऐसे मनोनीत व्यक्ति अपने-अपने क्षेत्रों की समस्याओं को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं और सदन में उनके समाधान के लिए मूल्यवान सुझाव दे सकते हैं। यह सुनिश्चित करेगा कि सदन में विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ शामिल हों और नीति निर्माण में उनका योगदान महत्वपूर्ण हो। मनोनयन की प्रक्रिया में यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि केवल योग्य और अनुभवी व्यक्तियों को ही सदन में लाया जाए। केवल राजनीतिक प्रभाव या पैरवी के आधार पर मनोनयन नहीं होना चाहिए, बल्कि व्यक्ति की योग्यता, अनुभव और समाज के प्रति योगदान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। यह बदलाव सदन की गुणवत्ता को बढ़ाएगा और यह सुनिश्चित करेगा कि नीति निर्माण प्रक्रिया अधिक प्रभावी और जनहितकारी हो। विशेषज्ञों की भागीदारी से जटिल समस्याओं के समाधान खोजने में मदद मिलेगी और देश के विकास को नई दिशा मिलेगी। सीबीपी श्रीवास्तव, अध्यक्ष, सेंटर फॉर एप्लाइड रिसर्च इन गवर्नेंस, का मानना है कि वर्तमान व्यवस्था अप्रचलित हो चुकी है और विशेषज्ञता आधारित मनोनयन ही भविष्य का मार्ग है।

