सागर जिला के बंडा में कजलिया परंपरा ने वर्षों पुरानी बुराइयों को मिटाने की दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस परंपरा को बुंदेलखंड की महान और गौरवशाली परंपरा माना जाता है। स्थानीय लोग इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक- दूसरे के घर जाकर कजलिया का आदान-प्रदान करते हैं। कजलिया एक- दूसरे को देने के बाद पुरानी बुराइयाँ दूर हो जाती हैं, जिससे आपसी सौहार्द और भाईचारा बढ़ता है। बंडा नगर और इसके आसपास के क्षेत्रों में लोग कजलिया के माध्यम से प्रेम और स्नेह का इज़हार करते हैं। यह परंपरा केवल एक सांस्कृतिक गतिविधि नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक संदेश भी देती है कि हम एक-दूसरे के साथ हैं। लोग एक-दूसरे की दुख-सुख में शामिल होते हैं, जिससे एकता और सहयोग की भावना मजबूत होती है। कजलिया परंपरा में पान, बीड़ी और हुक्के से मेहमानों का स्वागत किया जाता है। यह परंपरा दशहरा पर्व के दौरान विशेष रूप से मनाई जाती है, जब लोग एक- दूसरे को कजलिया देकर अपने प्रेम को प्रकट करते हैं। इस परंपरा का एक और रूप है, जिसे आपसी सौहार्द और भाईचारे का प्रतीक माना जाता है। स्थानीय लोग मानते हैं कि कजलिया देने से प्रेम बढ़ता है और यह केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि एक जीवनशैली है। बच्चों को भी यह सिखाया जाता है कि कजलिया का आदान-प्रदान कैसे किया जाता है। इससे न केवल रिश्ते मजबूत होते हैं, बल्कि समाज में एकता की भावना भी बढ़ती है। कजलिया परंपरा का सामाजिक प्रभाव गहरा है। यह स्थानीय समुदाय में भाईचारे और प्रेम को बढ़ावा देती है। लोग एक-दूसरे के घर जाकर मिलने और कजलिया देने में गर्व महसूस करते हैं। इस परंपरा के माध्यम से ही लोग यह संदेश भी देते हैं कि वे एक-दूसरे के सहयोगी हैं। कजलिया परंपरा ने सदियों से समाज में बुराइयों को मिटाने का कार्य किया है। जब लोग एक-दूसरे को कजलिया देते हैं, तो वे अपने मन के द्वार खोलते हैं और एक नई शुरुआत करते हैं। यह एक तरह से बुराई को खत्म करने का एक अनूठा तरीका है। इस परंपरा में शामिल होने वाले लोग हर साल अपनी पुरानी बुराइयों को छोड़कर एक नई शुरुआत करते हैं। कजलिया परंपरा से यह संदेश जाता है कि हम अकेले नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के साथ हैं।
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कजलिया परंपरा मिटाती है वर्षों पुरानी बुराइयाँ
30 अगस्त 2026 को 11:27 pm बजे
