न्यायिक आयोग की रिपोर्ट में सीवेज और पीने के पानी की पाइपलाइनें नियमों के उल्लंघन में पाई गईं, फिर भी कार्रवाई शून्य
कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने इंदौर में पीने के पानी की गंभीर समस्या पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी की सप्लाई से हुई मौतों पर न्यायिक आयोग की रिपोर्ट आने के बावजूद शहर की स्थिति अफ्रीका के छोटे गांवों जैसी हो गई है। उन्होंने आरोप लगाया कि राज्य सरकार इस मामले में जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने से बच रही है, जबकि इस त्रासदी में 36 लोगों की मौत हो चुकी है। सिंघार ने यह भी दावा किया कि रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की जाएगी, क्योंकि सत्ताधारी भाजपा ऐसा कभी नहीं चाहती थी। रिपोर्ट के अनुसार, भागीरथपुरा में सीवेज और पीने के पानी की पाइपलाइनें नियमों और मानकों का उल्लंघन करते हुए अगल-बगल बिछाई गई थीं, जिसके कारण पीने के पानी में सीवेज का पानी मिल गया। इस दूषित पानी में ई। कोलाई और टोटल कोलीफॉर्म जैसे बैक्टीरिया पाए गए, जिससे गैस्ट्रोएंटेराइटिस, उल्टी, दस्त और डिहाइड्रेशन जैसी बीमारियां हुईं। यह घटना दिसंबर 2025 में सामने आई थी, और तब से लोग और अस्पताल में भर्ती मरीज दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। सिंघार ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार ने पूर्व हाई कोर्ट जज सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता वाले आयोग के सामने असहयोग और हेरफेर का सहारा लिया ताकि कैबिनेट मंत्री कैलाश विजयवर्गीय, मेयर पुष्यमित्र भार्गव और पार्षद कमल बघेला को बचाया जा सके। उन्होंने कहा कि सीवरेज पाइपलाइन से जुड़े दस्तावेज मांगने पर भी आयोग को उपलब्ध नहीं कराए गए, जिससे जांच प्रक्रिया बाधित हुई। रिपोर्ट जारी होने के बाद भी जिम्मेदार लोगों पर कोई कार्रवाई न होने पर सिंघार ने निराशा व्यक्त की। उन्होंने कहा कि यह स्थिति 'खोदा पहाड़ निकली चुहिया' जैसी है। उन्होंने मुख्यमंत्री मोहन यादव से तुरंत कार्रवाई करने और जिम्मेदार लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। विधानसभा में विपक्ष के नेता ने मेयर पुष्यमित्र भार्गव के इस्तीफे की भी मांग की। सिंघार ने फाइल रोकने के मुद्दे पर मेयर भार्गव पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि मेयर को जनता को बताना चाहिए कि फाइल 66 दिनों तक क्यों रोकी गई। क्या यह फाइल इसलिए रोकी गई थी ताकि पाइपलाइन बिछाने का कॉन्ट्रैक्ट पाने वाली कंपनी से कमीशन लिया जा सके? यह एक गंभीर आरोप है जिस पर जवाबदेही बनती है। उन्होंने कहा कि भागीरथपुरा में पाइपलाइन प्रोजेक्ट में टेंडर बुलाने से लेकर काम पूरा होने तक कुल 859 दिनों की देरी हुई। इसमें से 66 दिनों की देरी सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि मेयर भार्गव ने फाइल पर साइन नहीं किए थे। यह देरी न केवल परियोजना की लागत बढ़ाती है, बल्कि नागरिकों को आवश्यक सेवाओं से भी वंचित रखती है।

