राजनीतिक दलों में टिकट वितरण की अलोकतांत्रिक प्रक्रिया देश के उच्च सदनों में योग्य और अनुभवी लोगों के पहुंचने की राह में सबसे बड़ी बाधा है। संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि राज्यसभा और विधान परिषद जैसे उच्च सदन अनुभवी, विषय विशेषज्ञ और गहरी जानकारी रखने वाले लोगों से युक्त हों, ताकि वे कानून निर्माण प्रक्रिया में महत्वपूर्ण योगदान दे सकें। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यह मंशा पूरी नहीं हो पा रही है। इसका सीधा कारण राजनीतिक दलों के भीतर की कार्यप्रणाली है, जो स्वयं लोकतांत्रिक नहीं है। टिकट वितरण का फैसला चुनिंदा लोगों द्वारा किया जाता है, जिसमें आम कार्यकर्ताओं या मतदाताओं की कोई भूमिका नहीं होती। यह अलोकतांत्रिक प्रक्रिया सिर्फ योग्य उम्मीदवारों को बाहर का रास्ता नहीं दिखाती, बल्कि गंभीर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को भी सदन तक पहुंचा देती है। बड़ी संख्या में ऐसे सांसद और विधायक हैं जिनके खिलाफ गंभीर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इसके बावजूद, राजनीतिक दल उन्हें बेझिझक टिकट देते हैं। जब तक टिकट देने की यह वर्तमान व्यवस्था जारी रहेगी, तब तक ऐसे ही जनप्रतिनिधि सदन में आते रहेंगे, जिनका लोकतंत्र या जनता से कोई सरोकार नहीं होगा। ये लोग अपने पांच साल के कार्यकाल में केवल अपनी आर्थिक तरक्की और राजनीतिक करियर को सुरक्षित करने में लगे रहते हैं, और यह सुनिश्चित करने की कोशिश करते हैं कि अगली बार भी उन्हें टिकट मिल जाए। जनता के पास इस मामले में बहुत सीमित विकल्प होते हैं, क्योंकि लगभग सभी राजनीतिक दल टिकट वितरण के लिए एक जैसी ही अलोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाते हैं। नतीजतन, जनता एक तरह से लाचार महसूस करती है। उन्हें यह तय करने का अवसर नहीं मिलता कि उनके क्षेत्र से चुनाव में उम्मीदवार कौन होगा। यह स्थिति सीधे तौर पर लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के विपरीत है, जहां जनता को अपने प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार सर्वोपरि है। इसके विपरीत, अमेरिका और यूरोपीय देशों में उम्मीदवारों के चयन में जनता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। अमेरिका में, राजनीतिक दल या उनके शीर्ष नेता यह तय नहीं करते कि चुनाव कौन लड़ेगा। इसके बजाय, यह फैसला पार्टी के भीतर होने वाले प्राथमिक चुनावों के माध्यम से जनता द्वारा किया जाता है। इसी तरह, ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में भी, उम्मीदवारों के चयन में पार्टी के सदस्यों और जमीनी कार्यकर्ताओं की प्रभावी भागीदारी होती है। भारत में भी इसी तरह की प्राथमिक चुनाव प्रणाली को अपनाने की आवश्यकता है। यदि हम इस प्रणाली को अपनाते हैं, तो देश में जमीनी स्तर पर लोकतंत्र मजबूत होगा। यह न केवल योग्य और साफ छवि वाले लोगों को संसद और विधानसभाओं में लाने में मदद करेगा, बल्कि चुनाव में धनबल के प्रभाव को भी कम करेगा। राजनीति को अधिक समावेशी बनाने और बेहतर जनप्रतिनिधियों को सदन तक पहुंचाने के लिए यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा। त्रिलोचन शास्त्री, जो एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के संस्थापक हैं, इस व्यवस्था के लंबे समय से आलोचक रहे हैं। उनका मानना है कि उच्च सदनों में योग्य लोगों की कमी का मुख्य कारण राजनीतिक दलों के भीतर की अलोकतांत्रिक संरचना है। शास्त्री के अनुसार, जब दल स्वयं लोकतांत्रिक नहीं हैं, तो वे कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि उनके द्वारा चुने गए उम्मीदवार योग्य और जनहितैषी होंगे।
समाचार
टिकट वितरण में जनता की भूमिका से सुधरेगा लोकतंत्र
2 नवंबर 2026 को 10:51 pm बजे

टिकट वितरण में जनता की भूमिका से सुधरेगा लोकतंत्र
