आपसी सहयोग से बचाई जा सकती हैं जिंदगियां
नेपाल में आई जल-प्रलय ने एक बार फिर से प्राकृतिक आपदाओं के सामने हमारी लाचारी को उजागर किया है। बीते बुधवार को आई इस भयावह त्रासदी में जन- धन की व्यापक हानि हुई है। इस घटना ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग के प्रभाव अब हमारे जीवन को सीधे तौर पर प्रभावित कर रहे हैं। विज्ञानियों ने चेतावनी दी है कि बढ़ता तापमान ग्लेशियरों के पीछे हटने की रफ्तार को बढ़ा रहा है। हाल के वर्षों में बर्फबारी और बारिश के पैटर्न में तेजी से बदलाव भी आ रहा है। इस बदलाव का नतीजा यह है कि हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं की पुनरावृत्ति बढ़ रही है, जिससे खतरे की घंटी बज चुकी है। नेपाल में इस त्रासदी के बाद कहा गया है कि यदि चीन समय रहते आपदा की सूचना दे देता तो सैकड़ों लोगों की जान बचाई जा सकती थी। यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आपसी सहयोग और सूचनाओं का आदान-प्रदान कितना महत्वपूर्ण है। इस भीषण बाढ़ से नेपाल के कई जिलों में पुलों, सड़कों और सार्वजनिक संपत्तियों को भारी नुकसान पहुंचा है। इससे साफ है कि हमें आपदा से निपटने की हमारी तैयारियों में गंभीर चूकें हैं। अब भले ही इस तबाही की मूल वजह हिमखंड टूटना, ग्लेशियर झील का फटना या जमीन का खिसकना बताया जा रहा हो, लेकिन हमें इन बातों को गंभीरता से लेना होगा। दक्षिण एशियाई देशों के लिए यह एक गंभीर चेतावनी है। हिमालयी क्षेत्र में प्राकृतिक आपदाओं के प्रति सजग रहना अत्यंत आवश्यक है। अब भविष्य में ऐसी आपदाओं को टालने के लिए किसी भी तरह की उदासीनता नहीं बरती जा सकती है। हिमालयी क्षेत्रों में स्थित देशों को भूस्खलन, ग्लेशियर झीलों और हिमस्खलन की घटनाओं की सूचना तुरंत साझा करने की आवश्यकता है। यह प्रयास उन सभी देशों के बीच शुरू होना चाहिए जिनकी सीमाओं से ये नदियां गुजरती हैं। इस प्राकृतिक रौद्र में नेपाली लोगों और विदेशियों समेत मरने वालों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है। ऐसे में, हमें तकनीक, जलवायु अनुकूल निर्माण कार्यों और स्थानीय लोगों की भागीदारी को बढ़ावा देकर आपातकालीन स्थिति में तुरंत प्रतिक्रिया देने की प्रक्रिया को और बेहतर बनाना होगा।
