भोपाल के एम्स ने चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। यहां महज चार महीने के शिशु के दोनों कानों में एक साथ सफल कॉक्लियर इम्प्लांट किया गया। इस प्रक्रिया से न केवल बच्चे की सुनने की क्षमता प्रभावित होगी, बल्कि उसके विकास में भी मदद मिलेगी। शिशु के दोनों कानों में एक ही सत्र में प्रत्यारोपण करने से ध्वनि पहचानने और सुनने के विकास में लाभ मिलेगा। चिकित्सकों के अनुसार, इतनी कम उम्र में उपचार शुरू करना बेहद महत्वपूर्ण था। प्रारंभिक वर्षों में सुनने और बोलने की क्षमता का विकास समय की मांग करता है। कॉक्लियर इम्प्लांट के इस द्विपक्षीय प्रत्यारोपण में नवीनतम तकनीक और स्मार्टनैव निगरानी प्रणाली का इस्तेमाल किया गया। एम्स भोपाल के ईएनटी विभाग की टीम ने इस चुनौतीपूर्ण प्रक्रिया को सफलतापूर्वक पूरा किया। बच्चे का जन्म समय से पहले हुआ था और उसे जन्म के बाद नवजात गहन चिकित्सा इकाई में एक महीने से अधिक समय तक भर्ती रखा गया था। इसके अलावा, इस दौरान बच्चे को मस्तिष्क ज्वर भी हुआ। इस सर्जरी में वरिष्ठ रेजिडेंट डॉ. रिम्शा खान, कनिष्ठ रेजिडेंट डॉ. ट्विशा चटर्जी और ऑडियोलॉजिस्ट सनी खुराना ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस टीम ने मिलकर इस जटिल सर्जरी को अंजाम दिया। एम्स भोपाल की टीम इस सफल कॉक्लियर इम्प्लांट के कार्य को मध्य भारत में सबसे कम उम्र का प्रत्यारोपण मानती है। इसे कॉक्लियर इम्प्लांट के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
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शिशु के कानों में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट
29 अगस्त 2026 को 3:34 pm बजे

शिशु के कानों में सफल कॉक्लियर इम्प्लांट
