मामूली कहासुनी बनी जानलेवा, जवानों के बीच बढ़ते तनाव और मानसिक स्वास्थ्य पर उठे गंभीर सवाल
जम्मू-कश्मीर के कठुआ में सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) के एक जवान द्वारा अपने चार साथियों की हत्या की घटना ने सुरक्षा बलों के भीतर पनप रहे गहरे असंतोष और छिपे हुए खतरों की भयावह तस्वीर पेश की है। यह दुखद है कि देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले एक प्रमुख सुरक्षा बल के चार जवान असमय काल के गाल में समा गए। यह घटना न केवल उन जवानों के परिवारों के लिए एक असहनीय क्षति है, बल्कि यह केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में काम करने की स्थितियों और जवानों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी गंभीर प्रश्नचिन्ह लगाती है। इस वारदात को सीआईएसएफ के एक हेड कॉन्स्टेबल ने अपनी सर्विस एके-47 राइफल से गोलीबारी करके अंजाम दिया। बताया जाता है कि कार्यस्थल पर अपने छोटे बच्चे को लेकर आने को लेकर हुई एक मामूली बहस इस हिंसक टकराव में बदल गई। यह घटना इस बात का संकेत देती है कि सुरक्षा बलों में जवानों के बीच छोटे-छोटे विवाद भी कितनी जल्दी घातक रूप ले सकते हैं। हालांकि, यह भी समझना महत्वपूर्ण है कि हर छोटा विवाद हिंसक नहीं हो जाता, लेकिन ऐसे संकेतों पर समय रहते ध्यान देना अत्यंत आवश्यक है ताकि किसी बड़ी दुर्घटना को टाला जा सके। दरअसल, सुरक्षा बलों का ढांचा पुराने ढर्रे पर चल रहा है, जो नई पीढ़ी की आकांक्षाओं के साथ तालमेल बिठाने में नाकाम साबित हो रहा है। वक्त बदला है और रोजगार के सीमित अवसरों के चलते उच्च शिक्षा प्राप्त युवा भी इन सुरक्षा बलों में भर्ती हो रहे हैं। जब ये युवा सुनहरे भविष्य के सपने लेकर इन बलों में आते हैं, तो उन्हें कठोर अनुशासन और सख्त नियमों के साथ सामंजस्य बिठाने में कठिनाई होती है। कई बार वे अपने अधिकारियों के सख्त व्यवहार से भी परेशान रहते हैं। दूर-दराज के इलाकों में तैनात जवानों को लंबी और अनियमित ड्यूटी, परिवार से जुड़ी मुश्किलें और घर से लंबे समय तक दूर रहने जैसी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इन परिस्थितियों में जवानों का अपने अधिकारियों से कई मुद्दों पर वैचारिक मतभेद होना स्वाभाविक है। यदि इन मतभेदों को समय पर समझा और सुलझाया न जाए, तो वे मनमुटाव का रूप ले सकते हैं, जो अंततः घातक परिणाम दे सकता है। विगत में भी मानसिक द्वंद्व से गुजर रहे सुरक्षा बलों के जवानों द्वारा हिंसक प्रतिरोध के मामले सामने आए हैं। गृह मंत्रालय की एक टास्क फोर्स ने कुछ वर्ष पूर्व केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में जवानों द्वारा अपने साथियों की हत्या के कारणों की पहचान की थी। इस जांच में पाया गया कि कठोर सेवा शर्तें, छुट्टी मिलने में देरी (विशेषकर परिवार में आपात स्थिति के समय), आलोचना, उत्पीड़न पर प्रतिक्रिया और साथियों के अनुचित व्यवहार के कारण हिंसक प्रतिक्रियाएं बढ़ी हैं। यह समझना भी जरूरी है कि सुरक्षा कर्मियों का अनिवार्य रूप से हथियार रखना ड्यूटी का हिस्सा है, जिससे किसी तनाव से गुजर रहे जवान के व्यवहार पर संवेदनशीलता से नजर रखने की आवश्यकता बढ़ जाती है। कठुआ की घटना की जांच में यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि क्या इस मामले में निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। यह सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है कि भविष्य में किसी भी सशस्त्र बल के भीतर का मनमुटाव कभी इतने घातक परिणामों तक न पहुंचे। निस्संदेह, जवानों की मौत के लिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि केंद्रीय सशस्त्र सुरक्षा बलों में ऐसे दुखद हादसों को टालने के लिए जवानों की शिकायतों के समाधान हेतु एक प्रभावी तंत्र और असरदार निगरानी की तत्काल आवश्यकता है। जवानों का अनुशासित होना किसी भी सुरक्षा बल की अपरिहार्य शर्त है, लेकिन आज की पीढ़ी में पुरानी पीढ़ी जैसा धैर्य और सहनशीलता कम देखने को मिलती है। यह एक जटिल चुनौती है, क्योंकि सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्रों में ऑपरेशन के लिए जवानों का हरदम शस्त्रों से लैस रहना भी लाजिमी है। ऐसे में, जवानों की मानसिक स्थिति और व्यवहार पर संवेदनशील ढंग से नजर रखना, साथ ही हथियारों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करना, बचाव की रणनीति का अहम हिस्सा हो सकता है। यह घटना इस ओर भी इशारा करती है कि जवानों से जुड़ी समस्याओं के निपटारे के लिए एक मजबूत प्रणाली बनाने की सख्त जरूरत है। यह प्रणाली ऐसी होनी चाहिए जो जवानों की शिकायतों को सुने, उनकी चिंताओं को समझे और उनका समय पर समाधान करे। केवल अनुशासनात्मक कार्रवाई पर जोर देना पर्याप्त नहीं है; हमें जवानों के मानसिक और भावनात्मक कल्याण को भी प्राथमिकता देनी होगी। उन्हें मनोवैज्ञानिक सहायता आसानी से उपलब्ध होनी चाहिए ताकि वे तनाव और दबाव का सामना बेहतर ढंग से कर सकें। सुरक्षा बलों में सुधार की आवश्यकता केवल प्रक्रियात्मक नहीं, बल्कि संरचनात्मक भी है। पुरानी ढर्रे पर चल रहे ढांचे को बदलते वक्त की आकांक्षाओं के अनुरूप ढालना होगा। नई पीढ़ी की अपेक्षाओं और चुनौतियों को समझना होगा और उसके अनुसार नीतियों और कार्यप्रणाली में बदलाव लाना होगा। निगरानी और किसी भी टकराव को टालने के लिए उपायों पर गंभीर पहल होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि मामूली विवाद कभी घातक रूप न ले लें। दरअसल, सुरक्षा बलों के जवानों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे देश की सीमाओं और आंतरिक सुरक्षा की रक्षा करते हैं, और अक्सर कठिन और खतरनाक परिस्थितियों में काम करते हैं। इसमें बेहतर आवास, स्वास्थ्य सुविधाएं, परिवार के लिए समर्थन और करियर में उन्नति के अवसर शामिल हैं।
