सीहोर जिले में भुजरिया पर्व का आयोजन धूमधाम से किया गया। इस पर्व को जिले के विभिन्न नगरों और ग्रामीण क्षेत्रों में उत्साह के साथ मनाया गया। भुजरिया पर्व का महत्व स्थानीय संस्कृति में गहरा है, जो पारंपरिक आस्था और सामाजिक उत्साह का प्रतीक माना जाता है। इस पर्व के दौरान गांव-गांव में अनेक परंपराएं निभाई गईं। ग्रामीणों ने एक-दूसरे को भुजरिया देकर गले मिले और छोटे-बड़े ने एक-दूसरे से आशीर्वाद लिया। यह पर्व विशेष रूप से रक्षाबंधन के अगले दिन मनाया जाता है, जो इसे और भी खास बनाता है। भुजरिया पर्व की एक प्रसिद्ध लोकमान्यता बुंदेलखंड के वीर योद्धाओं आल्हा और ऊदल से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भुजरिया की परंपरा का संबंध महोबा के आल्हा-ऊदल और उनकी वीरगाथाओं से रहा है। इस दिन कई स्थानों पर डंडे खेले गए और पारंपरिक खेलों का आयोजन भी किया गया। भुजरिया पर्व को मनाने की परंपरा में अच्छी वर्षा, अच्छी फसल और परिवार एवं समाज की खुशहाली की कामना की जाती है। बरसात के मौसम में जब खेतों में हरियाली छा जाती है, तब यह पर्व प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का माध्यम बनता है। इस दौरान भुजरिया का पूजन किया गया। इसके बाद भुजरिया जुलूस निकाला गया, जिसमें ग्रामीणों ने मिलकर उत्सव मनाया। कई स्थानों पर आल्हा गायन, दंगल और पारंपरिक खेलों की परंपरा भी देखने को मिली। भुजरिया पर्व के अंत में ग्रामीणों ने भुजरिया को नदी और तालाबों में विसर्जित किया। इस प्रकार, यह पर्व केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण सामाजिक और सांस्कृतिक घटना बन जाता है।
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धूमधाम से मनाया भुजरिया पर्व
30 अगस्त 2026 को 11:27 pm बजे
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