महाकाल वन की प्राचीन सीमाओं और उसके प्रवेश द्वारों के इतिहास को समझने के लिए अब उज्जैन से करीब 40 किलोमीटर दूर सामानेरा और टुकराल जैसे गांव महत्वपूर्ण कड़ियां बनकर उभरे हैं। यहां हुए पुरातात्विक समन्वेषण में प्राचीन मिट्टी के बर्तन, टेराकोटा के खिलौने, शिवलिंग, देवी-देवताओं की प्रतिमाएं और प्राचीन स्थापत्य के अवशेष मिले हैं। सामानेरा के ब्रह्माणी माता मंदिर में गुप्तकालीन मानी जाने वाली दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त प्रतिमा तथा टुकराल के माता खेड़ा यानी नागदेव मंदिर परिसर में प्राचीन मंदिर और सुरक्षा दीवार के अवशेष विशेष महत्व रखते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, ये स्थल अवंती-मालवा की धार्मिक, सांस्कृतिक और स्थापत्य परंपराओं के नए पहलुओं को सामने लाते हैं। अवंती-मालवा क्षेत्र विरासत अनुसंधान और संरक्षण यात्रा के तहत उज्जैन जिले के प्राचीन स्थलों का सर्वेक्षण किया गया। यात्रा के समन्वयक एवं सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय के कुलानुशासक प्रो. शैलेंद्रकुमार शर्मा और अश्विनी शोध संस्थान के निदेशक तथा पुरातत्वविद डा. रामचन्द्र ठाकुर ने बताया कि तराना, उज्जैन, माकड़ौन और महिदपुर तहसीलों के विभिन्न स्थलों पर प्रागैतिहासिक से लेकर गुप्तकालीन और परमारकालीन अवशेषों की पहचान की गई है। इनमें वैदिक, शैव, शाक्त और वैष्णव परंपराओं से जुड़े साक्ष्य शामिल हैं। माकड़ौन-तराना क्षेत्र में छोटी कालीसिंध नदी के तट पर स्थित सामानेरा महाकाल वन की प्राचीन सीमा से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थल है। यहां टेराकोटा के खिलौने, प्राचीन मृद्भांड और करीब 2000 वर्ष पुराना माना जाने वाला शिवलिंग मिलने की जानकारी सामने आई है। ब्रह्माणी माता मंदिर में गुप्तकालीन मानी जाने वाली दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती की संयुक्त प्रतिमा इस स्थल को विशिष्ट बनाती है। परिसर में गुप्तकाल और परमारकाल की शिव प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। स्थानीय लोगों ने प्राचीन मूर्तियों को सुरक्षित रखते हुए यहां मंदिर विकसित किया है। क्षेत्र को प्राचीन उज्जयिनी और महाकाल वन से जोड़ने वाली स्थानीय मान्यताएं भी प्रचलित हैं। टुकराल के माता खेड़ा मंदिर परिसर में बेसाल्ट पत्थरों के बड़े खंड, प्राचीन स्तंभों के अवशेष और बिना गारे के पत्थरों को जोड़कर बनाई गई परकोटे जैसी संरचना मिली है। विशेषज्ञों के अनुसार, वर्तमान मंदिर जिस टीले पर स्थित है, उसके नीचे प्राचीन मंदिर के अवशेष दबे होने की संभावना है। यहां हरिहर यानी शिव-विष्णु के संयुक्त स्वरूप, नवदुर्गा, गणेश, नागदेवता और गंगा, यमुना व सरस्वती की प्रतिमाएं भी मौजूद हैं। ये अवशेष विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सह-अस्तित्व की झलक देते हैं। विशेषज्ञों ने बिखरी प्राचीन प्रतिमाओं और स्थापत्य अवशेषों को एकत्र कर सुरक्षित रखने की जरूरत बताई है। इसके लिए सम्राट विक्रमादित्य विश्वविद्यालय और अश्विनी शोध संस्थान की ओर से संगोष्ठी आयोजित करने तथा श्रमदान के माध्यम से संरक्षण की योजना बनाने की बात कही गई है। इन स्थलों का व्यवस्थित पुरातात्विक अध्ययन और वैज्ञानिक संरक्षण होने पर मालवा के प्राचीन इतिहास की कई महत्वपूर्ण कड़ियों को समझने में मदद मिल सकती है।
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उज्जैन के निकट मिले महाकाल वन के प्राचीन प्रवेश द्वार के साक्ष्य, विरासत उजागर
18 अक्टूबर 2026 को 11:52 pm बजे

उज्जैन के निकट मिले महाकाल वन के प्राचीन प्रवेश द्वार के साक्ष्य, विरासत उजागर
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