मणिपुर में सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बावजूद हिंसा की निरंतर वापसी इस कड़वी सच्चाई को उजागर करती है कि वास्तविक शांति की स्थापना केवल बल प्रयोग से संभव नहीं है। कामजोंग जिले में हाल ही में कुकी समुदाय के घरों को जलाया जाना और नगा समुदाय के परित्यक्त मकानों का राख होना राज्य में कानून के प्रति पूर्ण अवहेलना का प्रमाण है। चस्साद गांव में गोलीबारी, हताहतों की संख्या और दर्जनों घरों का जलकर खाक होना, मात्र आपराधिक कृत्य नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की गंभीर विफलता को दर्शाते हैं। इन घटनाओं के मूल में नगा और कुकी समुदायों के बीच बढ़ता तनाव, पुराने भूमि विवाद, प्रतिशोध की भावना और सुरक्षा व्यवस्था के प्रति गहरा अविश्वास निहित है। मणिपुर का संकट अब केवल मैतेयी-कुकी संघर्ष तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पहाड़ी इलाकों में नगा-कुकी टकराव ने भी भयावह रूप ले लिया है। मई 2023 के जातीय दंगों से शुरू हुआ यह सिलसिला अब बहुआयामी हिंसक रूप धारण कर चुका है, जिसमें जमीन, पहचान और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे बारूद का काम कर रहे हैं। सुरक्षा बलों की बड़ी संख्या में मौजूदगी के बावजूद हिंसा का न रुकना एक गंभीर प्रश्न खड़ा करता है। यह स्पष्ट है कि केवल अतिरिक्त बल भेजना और खोखली शांति-अपीलें जारी करना कोई समाधान नहीं है। जब तक राज्य में एक व्यापक खुफिया तंत्र सक्रिय नहीं होता, अवैध हथियार जब्त नहीं किए जाते और हमलावरों के खिलाफ निष्पक्ष कार्रवाई नहीं होती, तब तक बंदूकें खामोश नहीं हो सकतीं। यदि उपद्रवियों में सजा का भय न हो और पीड़ितों को सुरक्षा का भरोसा न मिले, तो हिंसा की पुनरावृत्ति को रोकना असंभव है। मणिपुर की असली परीक्षा केवल हिंसा के बाद 'सब ठीक ठाक है' का दिखावा करने में नहीं, बल्कि ऐसी परिस्थितियां बनाने में है जहाँ हिंसा दोबारा जन्म ही न ले सके। जब तक हर नागरिक अपने घर, रास्ते और भविष्य को सुरक्षित महसूस नहीं करेगा, तब तक शांति केवल एक सरकारी दावा बनी रहेगी, सामाजिक वास्तविकता नहीं।
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मणिपुर में हिंसा: सुरक्षा तैनाती के बावजूद चुनौती
20 अक्टूबर 2026 को 10:29 pm बजे
