चीनी पूंजी के साथ भारतीय सहयोग जरूरी
चीन के साथ बांग्लादेश का जुड़ाव अपने आप में भारत के लिए खतरा नहीं है और न ही ढाका से यह अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह अपनी आर्थिक पसंदों को नई दिल्ली की रणनीतिक प्राथमिकताओं के अधीन कर दे। फिर भी, ऐसे समय में जब द्विपक्षीय संबंध तनावपूर्ण हैं और बांग्लादेश भारतीय बाजार में निरंतर तरजीही पहुंच चाहता है, चीनी वित्तपोषण से मोंगला बंदरगाह का आधुनिकीकरण एक बड़ा सवाल उठाता है: क्या आर्थिक विविधीकरण उन क्षेत्रीय संबंधों को कमजोर किए बिना सफल हो सकता है, जिन पर समृद्धि निर्भर है? इसका उत्तर वाणिज्यिक अवसर और रणनीतिक गणना के बीच अंतर करने में निहित है। बांग्लादेश को आधुनिक बुनियादी ढांचे, निर्यात बाजारों और विदेशी पूंजी की आवश्यकता है। चीनी वित्तपोषण इन जरूरतों को पूरा करने में मदद कर सकता है, बशर्ते परियोजनाएं पर्याप्त प्रतिफल दें और उनकी संविदात्मक शर्तें राष्ट्रीय हितों की रक्षा करें। अपेक्षाकृत कम ब्याज दर वाला ऋण अपने आप लाभकारी नहीं होता। निर्माण लागत, भविष्य का राजस्व, पुनर्भुगतान दायित्व और विदेशी मुद्रा पर संभावित दबाव—सभी को गणना में शामिल करना होगा। पारदर्शिता और स्वतंत्र जांच के बिना, आकर्षक दिखने वाली परियोजना दीर्घकालिक राजकोषीय दायित्व बन सकती है। श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह का अनुभव दिखाता है कि वाणिज्यिक वास्तविकताओं से आगे निकल जाने वाली बुनियादी ढांचा महत्वाकांक्षाएं कितनी जोखिमपूर्ण हो सकती हैं। इससे यह स्थापित नहीं होता कि मोंगला भी उसी दिशा में जाएगा, लेकिन यह रेखांकित करता है कि अनुमानित माल-ढुलाई मात्रा, ऋण की स्थिरता और संचालन संबंधी व्यवस्थाओं की कठोर जांच क्यों जरूरी है। न ही केवल चीनी वित्तपोषण से सैन्य पहुंच हासिल करने की मंशा सिद्ध होती है। फिर भी, बांग्लादेश का आर्थिक भूगोल ऐसी सीमाएं लगाता है, जिन्हें कूटनीति की इच्छा से दूर नहीं किया जा सकता। स्थल-आधारित संपर्क, नेपाल और भूटान तक पहुंच तथा व्यापक क्षेत्र के साथ व्यापार के लिए भारत अब भी केंद्रीय है। दोनों देश ऐसी नदियां भी साझा करते हैं, जिनका प्रबंधन तेजी से महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि जलवायु परिवर्तन मीठे पानी की आपूर्ति पर दबाव बढ़ा रहा है। दिसंबर 2026 में गंगा जल बंटवारा संधि की आसन्न अवधि-समाप्ति रचनात्मक संवाद को विशेष रूप से जरूरी बनाती है। भारत के साथ टिकाऊ जल-बंटवारा समझौते पर बांग्लादेश की ओर से कोई बाहरी वित्तदाता बातचीत नहीं कर सकता। हालांकि, आर्थिक परस्पर निर्भरता नई दिल्ली में आत्मसंतोष का बहाना नहीं बननी चाहिए। बांग्लादेश के पास व्यापक निर्यात अवसर और अधिक संतुलित वाणिज्यिक संबंध तलाशने के वैध कारण हैं। भारत की अपनी विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि वह बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को कुशलता से पूरा करे, सीमा-पार व्यापार को सुगम बनाए और ऐसे व्यावहारिक प्रबंधों पर बातचीत करे, जिनसे दोनों पक्षों को लाभ हो। 1971 में बांग्लादेश की मुक्ति में भारत की भूमिका सहित ऐतिहासिक एकजुटता महत्वपूर्ण बनी हुई है, लेकिन वह अनिश्चितकाल तक समकालीन आर्थिक प्रदर्शन का विकल्प नहीं हो सकती। अल्प-विकसित देश की स्थिति से संक्रमण भी ढाका के सामने मौजूद विकल्पों को अधिक तात्कालिक बनाता है। जैसे-जैसे तरजीही व्यापार व्यवस्थाओं पर दबाव बढ़ेगा, बांग्लादेश को प्रतिस्पर्धी निर्यात, भरोसेमंद लॉजिस्टिक्स और पड़ोसी बाजारों तक पहुंच की जरूरत होगी। पारस्परिक व्यापार रियायतें और सीमा हाटों का पुनरुद्धार व्यावहारिक लाभ दे सकते हैं, बिना इस आवश्यकता के कि कोई भी सरकार बड़ी भू-राजनीतिक घोषणाएं करे। बांग्लादेश को भारतीय निकटता और चीनी पूंजी में से किसी एक को चुनना जरूरी नहीं है। हालांकि, उसे यह सुनिश्चित करना होगा कि बाहरी साझेदारियां उसके कार्यक्षेत्र का विस्तार करें, न कि नई निर्भरताएं पैदा करें। वहीं भारत को भौगोलिक अधिकार मानकर सहयोग की अपेक्षा करने के बजाय ठोस लाभों के माध्यम से उसे अर्जित करना होगा। क्षेत्रीय स्थिरता को तब बेहतर सेवा मिलेगी, जब बुनियादी ढांचे संबंधी फैसलों का मूल्यांकन वाणिज्यिक योग्यता के आधार पर हो, पारदर्शी संस्थाओं के जरिए संप्रभुता की रक्षा की जाए और साझा समस्याओं का समाधान रणनीतिक संदेह के बजाय बातचीत से किया जाए।
