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मध्य प्रदेश की जेलों में बंद कैदियों की थाली तक पहुंचने वाले अनाज की खरीद व्यवस्था में बड़ा बदलाव होने जा रहा है। सालाना लगभग 200 करोड़ रुपए के खाद्यान्न की खरीद में अब जेलों की मनमानी खत्म होगी। गुणवत्ता को लेकर उठते रहे सवालों और खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता की जरूरत के मद्देनजर, राज्य सरकार ने जेलों के लिए सामग्री खरीदने का तरीका बदल दिया है। अब प्रदेश की जेलें अपने स्तर पर खाद्यान्न सामग्री की खरीद नहीं कर सकेंगी, बल्कि इसके लिए केंद्र सरकार के गवर्नमेंट ई-मार्केटप्लेस (जेम) पोर्टल का सहारा लिया जाएगा। सरकार की मंशा खरीद प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने, प्रतिस्पर्धा बढ़ाने और भ्रष्टाचार की आशंकाओं पर अंकुश लगाने की है। इस बदलाव को जेलों की खरीद व्यवस्था में एक बड़े सुधार के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, इस फैसले की असली परीक्षा पोर्टल पर खरीद शुरू होने के बाद ही होगी। कैदियों को मिलने वाले भोजन की गुणवत्ता में कितना सुधार होता है, खाद्यान्न की आपूर्ति समय पर होती है या नहीं और निर्धारित मानकों का पालन किस तरह कराया जाता है, ये सवाल नई व्यवस्था की सफलता तय करेंगे। मध्य प्रदेश की जेलों में कैदियों के भोजन और दूसरी आवश्यकताओं के लिए बड़े पैमाने पर खाद्यान्न एवं अन्य सामग्री खरीदी जाती है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, प्रदेशभर की जेलों में इस मद में हर साल करीब 200 करोड़ रुपए खर्च होते हैं। इतनी बड़ी राशि की खरीद में प्रक्रिया की पारदर्शिता और गुणवत्ता की निगरानी महत्वपूर्ण हो जाती है। अब तक जेलों के स्तर पर होने वाली खरीद व्यवस्था को लेकर सवाल उठते रहे हैं। नई नीति के तहत खरीद को जेम पोर्टल से जोड़ने का उद्देश्य यह है कि सामग्री की उपलब्धता, कीमत और आपूर्तिकर्ताओं के विकल्पों की तुलना एक व्यवस्थित प्रक्रिया के तहत की जा सके। इससे खरीद के दौरान मनमानी की गुंजाइश कम करने में मदद मिल सकती है। केवल ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर खरीद शुरू कर देने से गुणवत्ता की गारंटी नहीं मिल जाती। इसके लिए जरूरी होगा कि खाद्यान्न की आपूर्ति से पहले और बाद में उसकी गुणवत्ता की जांच हो तथा निर्धारित मानकों पर खरा नहीं उतरने वाली सामग्री के खिलाफ कार्रवाई की जाए।
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