एचआर-सीएसआर सम्मेलन का शुभारंभ करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण का जीवन समाज के लिए प्रेरणास्रोत है
मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने 2 दिवसीय चतुर्थ राष्ट्रीय एचआर-सीएसआर कॉन्फ्रेंस 'अभ्युदय: 2026' का शुभारंभ किया। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण का पूरा जीवन समाज के लिए एक आदर्श है, जिन्होंने चुनौतियों के बीच अपना मानव धर्म और राजधर्म निभाया। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि हमारी सरकार म.प्र. में उन सभी स्थानों को विकसित कर रही है जहां भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण के चरण पड़े हैं, जिन्हें राम वन गमन पथ और कृष्ण पाथेय के रूप में विकसित किया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि भगवान श्रीकृष्ण के जीवन पर गहन शोध और सम्पूर्ण जीवन वृत्त की मीमांसा करने वाले शोधार्थियों और संस्थाओं को सरकार पूरा सहयोग देगी। यह सम्मेलन 25 अक्टूबर तक जारी रहेगा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कुशाभाऊ ठाकरे सभागार में फोर्थ नेशनल कांफ्रेंस फॉर एचआर-सीएसआर 'अभ्युदय' को संबोधित करते हुए कहा कि जहाँ गीता समाप्त होती है, वहीं से जीवन का अभ्युदय प्रारंभ होता है। भगवान श्रीकृष्ण के जीवन से हम प्रतिदिन कुछ न कुछ सीखते हैं, जिन्होंने जीवन की हर परिस्थिति में अपना मानव धर्म और राजधर्म निभाया। उन्होंने एक सर्वशक्तिमान सत्ताधीश (कंस) का वध किया, परन्तु खुद उसकी सत्ता पर आसीन नहीं हुए और न ही कभी खुद को राजा कहलाना पसंद किया। सुदामा के साथ मित्रता का उन्होंने सदैव मान रखा। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने इस 2 दिवसीय नेशनल कॉन्फ्रेंस का दीप प्रज्ज्वलन कर शुभारंभ किया। कार्यक्रम के दौरान इंडोनेशिया से आए पद्मश्री डॉ. अगुष इंद्र उद्याना ने मुख्यमंत्री डॉ. यादव को एक पारम्परिक घंटी भेंट की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण सहित सभी देवी-देवताओं के व्यक्तित्व के उस पक्ष पर मंथन की जरूरत है, जब उनके जीवन में चुनौतियां आईं और उन्होंने मानव समाज के कल्याण के लिए मार्ग निकाला। श्रीकृष्ण का जन्म कारागार में हुआ और उनके माता-पिता व स्वयं उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन में अनेक कष्ट सहे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण अपने संकल्पों पर अडिग रहते थे, जैसे यशोदा मैया को वचन दिया था कि कंस को मारकर मथुरा से लौटने पर उनके हाथ से माखन खाएंगे, लेकिन कारागार में देवकी से मिलने पर उन्होंने माखन खाने से इनकार कर दिया क्योंकि वे वचनबद्ध थे। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने कहा कि श्रीकृष्ण ने मोर पंख को सिर पर धारण कर प्रकृति पूजा की संस्कृति को प्रोत्साहन दिया। कंस वध के बाद भी उन्होंने सत्ता नहीं संभाली और महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राजगद्दी पर बैठाया। वे स्वयं द्वारिका आ गए, तो अपने पुत्र को सिंहासन पर नहीं बैठाया, यह सिखाते हुए कि जो योग्य है उसे जिम्मेदारी मिलेगी। इसी प्रकार विक्रमादित्य काल में भी यह प्रसंग देखने को मिलता है। श्रीकृष्ण और सम्राट विक्रमादित्य ने स्वयं को कभी राजा नहीं माना, वे दोनों ही लोकतांत्रिक व्यवस्था के सच्चे हितैषी थे। उन्होंने उद्यमिता और सामाजिक समरसता के लिए द्वारिका नगरी की स्थापना की। मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने बताया कि श्रीकृष्ण और सुदामा ने एक साथ उज्जैन के सांदीपनि आश्रम में शिक्षा ग्रहण की, और हमारी स्कूली शिक्षा व्यवस्था भी इसी समरसता के विचार के साथ आगे बढ़ रही है। उन्होंने बताया कि हाल के एशियन गेम्स में मध्य प्रदेश के खिलाड़ियों ने 11 मेडल जीते, जिनमें से 5 स्वर्ण पदक थे।
