मध्य प्रदेश में बारिश की कमी, भूजल स्तर में गिरावट और छोटी नदियों की जल धारण क्षमता में लगातार हो रही कमी के कारण इस बार जल संकट की आशंका गहरा गई है। इसका सीधा असर रबी सीजन की प्रमुख फसल गेहूं पर पड़ सकता है, क्योंकि प्रदेश में गेहूं का करीब 30 फीसदी रकबा सिंचाई के लिए सीधे नदियों पर निर्भर है। अतिक्रमण, पेड़ों की कटाई और संरक्षण के अभाव में छोटी व सहायक नदियां सिकुड़ रही हैं, जिससे प्रमुख नदियों में 40 प्रतिशत तक पानी कम होने की स्थिति चिंता बढ़ा रही है। ये नदियां जल्दी सूख गईं तो किसानों को सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी मिलना मुश्किल होगा, जिससे उनकी चिंताएं बढ़ गई हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि बारिश के बाद नदियों में पानी का प्रवाह बनाए रखने में आसपास के पेड़-पौधों और प्राकृतिक जल संचयन की अहम भूमिका होती है। लेकिन नदियों के दोनों किनारों पर बढ़ते अतिक्रमण और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई ने इस प्राकृतिक व्यवस्था को गंभीर नुकसान पहुंचाया है। नदियों का बहाव क्षेत्र संकरा होने के साथ उनकी जल धारण क्षमता भी बुरी तरह प्रभावित हुई है, जो भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती है। भारतीय वन सेवा से सेवानिवृत्त एके बरोनिया के अनुसार, पेड़-पौधे बारिश के पानी को रोकने और उसे धीरे-धीरे जमीन में पहुंचाने में मदद करते हैं, जिससे नदियों को लंबे समय तक पानी मिलता रहता है। किनारों से पेड़ हटने के कारण यह प्राकृतिक चक्र प्रभावित हो रहा है। नदी संरक्षण के लिए विशेषज्ञों ने कई महत्वपूर्ण सुझाव दिए हैं, जिनमें प्रदेश में नदी संरक्षण प्राधिकरण का गठन, सभी छोटी नदियों का जिलेवार सर्वे, हर नदी की समस्याओं के अनुसार संरक्षण योजना बनाना शामिल है। इन सुझावों का उद्देश्य किसानों को नदियों के संरक्षण के प्रति जागरूक करना और उन्हें इस मुहिम में आगे लाना है।
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सूखे से एमपी में जल संकट की आशंका
18 अक्टूबर 2026 को 11:52 pm बजे

सूखे से एमपी में जल संकट की आशंका
